आत्मा के बचपन से स्नातक होने के लिए गहन व्याख्यान (2)
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
★माँगने वाले विचार के भीतर मौजूद देने वाली चेतना को विकसित करने के लिए
तेज़ समझ वाले तुम्हें यहाँ तक आते-आते शायद झलक मिल गई होगी।
हाँ, मनुष्य दूसरे जीवों से इस बात में अलग है कि प्रकट रूप के अपने के भीतर, प्रकट करने वाला अपना भी है।
इसलिए मनुष्य प्रेम माँगने के साथ-साथ प्रेम देने वाला पक्ष भी है।
पर धरती पर बहुत से लोग इस देने वाले पक्ष की चेतना को कुछ समय के लिए भूल गए थे, इसलिए शरीर बढ़कर वयस्क हो जाने पर भी मानस का केंद्र (आत्मा) अभी पूरा विकसित नहीं होता, और दूसरों से करवाने की चाह वाला विचार आसानी से प्रबल हो जाता है, ऐसी दुनिया बन गई थी।
यहाँ हम जिसे “कर देना” कहते हैं, उसका अर्थ है प्रेम देना, सहन करना, समेट लेना, यानी अपने और दूसरे को प्रेम करने और स्वीकार करने वाले मन का कार्य।

इस कार्य की तुलना मैदान में खिलने वाले पौधों और प्रकृति की स्थिति से करें, तो स्वीकार करने वाली चेतना, प्रेम का कार्य ही धरती है, ज़मीन के भीतर का पोषण भी है, वायुमंडल भी है, नमी भी है, सूर्य की किरणें भी हैं, और पराग ले जाने वाली हवा और कीट भी हैं।
मनुष्य का प्रेम मूल रूप से प्रकृति के इस सर्वव्यापी प्रेम से किसी भी तरह कम नहीं; वह सब लोगों को जीवंत करने वाली और प्रकृति की हर चीज़ और सब जीवों को भी अधिकतम जीवंत करने वाली, सर्वोच्च और सबसे बड़ी ऊर्जा है।
मनुष्य, नहीं, केवल मनुष्य नहीं, सब वस्तुएँ आकाश-धरती के प्रेम से जन्म लेकर पलती हैं, और जन्मी हुई चीज़ आत्म-चेतना की प्रबलता-दुर्बलता से परे बढ़ती है, अस्तित्व बनाए रखती है, और मिशन पूरा कर लेने पर आत्मिक आयाम में लौट जाती है, ऐसी व्यवस्था है।
इसलिए आत्मा के बचपन में मनुष्य का “प्रेम पाना चाहता हूँ” या “स्वीकार किया जाना चाहता हूँ” सोचना (मान्यता-इच्छा, स्वीकृति की चाह) अपने आप में ज़रूरी नहीं कि बुरा हो।
तो अभी कहा था कि उस विचार को भेजने का प्रस्थान-बिंदु और उस विचार की दिशा-कोण ग़लत होने से, स्वीकार किए जाने की चाह होते हुए भी स्वीकार न किए जाने का नतीजा आता है; पर मनुष्य के चेतना के विकास की ओर बढ़ने में, उसकी उन्नति-भावना में गति आती है या नहीं, अपनी इच्छा से अपने में आत्मविश्वास जगाकर अपने-दिव्य की चेतना में लौट पाता है या नहीं, यह इस पर निर्भर है कि इस “स्वीकार किया जाना चाहता हूँ” वाले विचार को भेजने के प्रस्थान-बिंदु और उसकी दिशा-कोण को सही बनाया जाए या नहीं, ऐसा कहा जा सकता है।
आज इस सिद्धांत को दृढ़ता से पकड़कर, अतृप्त कमी-भाव और अभाव-भाव के दलदल से निकलकर, भरे जाने वाले अपने और भरने वाले अपने को एक साथ पहचानने वाला चेतना का इस्तेमाल तुम सीख लो, यह चाहते हुए तरह-तरह के शब्दों से बात कर रहा हूँ। (अगली बार जारी)






