अंतिम स्पंदन-समायोजन से गुज़र रहे लोगों के लिए (उत्तरार्ध)
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(पिछली बार से जारी)
★पृथ्वी के विकास के साथ होने वाले अंतिम स्पंदन-समायोजन के बारे में
शर्त यह है कि ऐसी बातें अच्छी तरह समझकर जी रहे हो, लेकिन तुम लोग अभी जो पीड़ा महसूस कर रहे हो, उसके लिए बचा समय अब बहुत कम है।
क्योंकि ऐसा समय आएगा जब हर चीज़ को नकारात्मक रूप से लेने वाली भावनाएँ निकलना बंद हो जाएँगी।
बुरी बात सोचने की कोशिश करो, तब भी केवल बिना अनुभूति वाली भावनाएँ ही मन में ला सकोगे।
तुम लोगों को बुरे भाग्य से बाँधे रखने वाले, दिव्यता से बहुत दूर आत्म-सीमा वाले कर्म-विचार थे।
कहें तो अभी तुम लोग, ऐसे ग़लत विचारों के दोहराव से आगे बढ़ने की “अंतिम परीक्षा” दे रहे हो।
दूसरे शब्दों में, कह सकते हैं कि “अंतिम स्पंदन-समायोजन” के चरण में हो।
हम ब्रह्मांडीय मानवता जब किसी दूसरे तारे पर जाकर, उस तारे की धरती पर उतरते हैं, तो उड़न तश्तरी के भीतर के स्पंदन-समायोजन कक्ष में, जिस तारे पर उतरने वाले हैं उसके आकाश-धरती के विशिष्ट स्पंदन के अनुकूल मन-शरीर बनने के लिए स्पंदन-समायोजन लेकर ही उतरते हैं, और अभी तुम लोग, आत्मिक हो चुकी पृथ्वी के स्पंदन में ढल सकने वाले मन-शरीर में बदलने के लिए स्पंदन-समायोजन ले रहे हो, ऐसा भी कह सकते हैं।
पृथ्वी पर रहने वाले सभी लोग उस चरण से होकर, नए युग में जी सकने लगेंगे।

★इस सही घड़ी में तुम लोगों की निभाने योग्य भूमिका
यह अंतिम स्पंदन-समायोजन, तुम लोगों जैसे, चेतना के विकास की ओर उन्मुख होकर धीरे-धीरे लगातार अपने आप को निखारते और गहरा करते आए लोगों के लिए, कम से कम स्पंदन-समायोजन से पूरा हो जाता है, लेकिन जिनकी तैयारी अभी पूरी नहीं हुई है, उनके लिए यह थोड़ा कठिन भी लग सकता है।
उस सही घड़ी में तुम लोग जो करोगे, वह है धरती पर दिव्यता की लहरें बिखेरना, ताकि वे कम पीड़ा और कम दर्द के साथ, इस अंतिम स्पंदन-समायोजन को पार कर सकें।
यह कर सकने वाले, ब्रह्मांड कितना भी विशाल हो, केवल तुम लोग हो।
हम ब्रह्मांडीय मानवता भी, पृथ्वी-लोक के दिव्य-आत्मा भी, सहयोग का स्पंदन पूरी शक्ति से भेज रहे हैं, लेकिन स्पंदन बहुत अलग होने के कारण, वह पूरी मानवता तक नहीं पहुँच पा रहा, वास्तविक स्थिति यही है।
लेकिन धरती पर रहकर, लोगों के साथ सुख-दुख बाँट रहे तुम लोगों के मन-शरीर से होकर प्रकाशित दिव्यता का स्पंदन, कितनी भी ज़िद्दी कर्म की चट्टान को भेदकर, पृथ्वी की पूरी मानवता तक जीवन के मूल का प्रकाश पहुँचा सकता है।
इसलिए, हमारे सहयोग का ढंग भी, पहले सीधे दिव्य स्पंदन बिखेरने का था, लेकिन हाल में तुम लोगों का मन-शरीर, जीवन के मूल के स्पंदन को गुज़ार सकने तक विकसित हो गया है, इसलिए तुम लोगों के ज़रिए विकिरित करने वाले रूप में बदल गया है।
उसका प्रभाव अनुमान से परे बड़ा है, और पूरी मानवता को आत्मिकीकरण की धारा पर सवार करके, उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जा रहा है।
उस प्रक्रिया में, केवल अच्छी बातें ही हों ऐसा ज़रूरी नहीं, खिसकी हड्डी को फिर से जगह पर बिठाने जैसी पीड़ा भी होती है, लेकिन उस चरण से गुज़र जाओ, तो निश्चित रूप से पूरी मानवता अपनी दिव्यता याद करके, आत्मा की आत्मनिर्भरता प्राप्त कर सकेगी।
इस अर्थ में, तुम लोगों की भूमिका बड़ी है।
तुम लोग अभी, किसी और चीज़ से तुलना न की जा सके इतना बड़ा काम पूरा कर रहे हो।
तुम लोग, अतीत का कोई भी संत जो न कर सका, वह महान काम पूरा करने जा रहे हो।
इसलिए, अपनी आज की अवस्था कैसी भी हो, सब कुछ को भविष्य की खाद मानकर, उजले और आशावादी ढंग से जियो।
क्योंकि समय आने पर निश्चित रूप से, “अहा, उस अनुभव के कारण ही आज का मैं हूँ” यह दिल की गहराई से समझ आने का समय आएगा। (समाप्त)







