धर्म के पुनः उपयोग के बारे में (उत्तरार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
★धर्म का मूल रूप और धार्मिक नेताओं का हृदय-परिवर्तन
तो मूल धर्म वह है जो मानवता का सार, जीवन का सत्य समझाकर लोगों को सच्ची शांति और सामंजस्य की मनोदशा तक ले जाए।
और किसी से भी न टकराना, सबको मिलाना, हर अस्तित्व को संतुलित करना ही धर्म का मिशन है, ऐसा भी कहा जा सकता है।
इस दृष्टिकोण से देखें, तो बहुत से धर्मों और संप्रदायों में “जो हमारा धर्म नहीं मानता वह नहीं बचेगा” यह विचार अभी कहीं बचा हुआ होना भी बहुत होता है।
पर हर धर्म की ऐसी कमियों को फ़िलहाल एक ओर रखकर, धर्म-संप्रदाय, राष्ट्र-जाति, वृद्ध-युवा, स्त्री-पुरुष के भेद से परे, साझा उद्देश्य, समष्टि की शांति की ही साथ मिलकर प्रार्थना करने का आह्वान जिसने किया, वह जापान था।
तो विभिन्न धर्मों के इकट्ठा होकर किए गए शांति की प्रार्थना के आयोजन में भाग लेने वाले दुनिया भर के धार्मिक नेता, देवलोक के देवताओं की योजना के अनुसार, सच्चे मानवता के प्रति प्रेम के प्रति जागने लगे, धार्मिक टकराव के हथियार रखकर मेल-मिलाप की ओर सकारात्मक होने लगे।
देखते रहो, आख़िरकार बनी यह धारा आगे भी उलटी नहीं चलेगी, और आगे और-और बड़ी होती जाएगी।
क्योंकि सबसे बड़े साझा लक्ष्य, विश्व-शांति की प्राप्ति के लिए एक-दूसरे के अंतर को स्वीकार करना और सम्मान करना ही महत्वपूर्ण है, और अपनी-अपनी स्थिति में जड़ें रखने वाले विचारों के अंतर असल में कोई बड़ी समस्या नहीं थे, यह विभिन्न धार्मिक नेताओं ने सीखा और याद किया।

★उस भविष्य की ओर जहाँ दुनिया जापान की ओर देखेगी
आगे दुनिया के देशों में रहने वाली विश्व-मानवता, मन में शांति का दुर्ग बनाने का तरीक़ा स्थापित करके उसे लागू करने वाले केंद्रीय देश के रूप में, तुम लोगों के देश, जापान, की ओर देखने लगेगी।
इसलिए उस केंद्र के कार्यकर्ता तुम लोग, और-और स्वार्थ को मिटाकर, विश्व-मानवता के दिव्यता के पुनर्जागरण के लिए चढ़ने वाली सीढ़ी की भूमिका में एकाग्र रहो।
सीढ़ी बोलती नहीं, लोगों को चुनती नहीं, है न।
इसे चलने दूँगी पर उसे नहीं, ऐसी लोगों को चुनने वाली सीढ़ी नहीं होती, है न।
कोई भी उस पर क़दम रखे, बस लोगों को चलने देना, यही सीढ़ी है, और तुम लोगों की भूमिका भी है।
तुम लोगों का मन-शरीर पृथ्वी के लोगों के दिव्यता की दुनिया में ऊपर उठने के लिए महत्वपूर्ण सीढ़ी बना हुआ है।
आगे विश्व-मानवता जिस रास्ते पर चढ़कर आएगी, वह सब तुम लोगों का कभी गुज़रा हुआ रास्ता है, इसलिए तुम लोग चेतना के विकास की ओर बढ़ने वाली विश्व-मानवता के अच्छे सलाहकार बन सकोगे।
पर इसका मतलब यह नहीं कि तुम लोगों को ऊँची आवाज़ में कुछ चिल्लाने की ज़रूरत है।
बस दिव्यता को प्रकट करने वाला जीवन-रूप, वह पीठ, पूरी पृथ्वी की मानवता को दिखा देना भर काफ़ी है।
तुम लोगों के होने भर से पृथ्वी प्रकाशमय हो रही है, और तुम लोगों के अस्तित्व को छूने भर से विश्व-मानवता के लिए अपनी दिव्यता याद करना आसान हो गया है।
क्योंकि तुम लोग अब अस्तित्व से ही जीवन का प्रकाश ही बन चुके हो।
दुनिया भर के धार्मिक लोग तुम लोगों के ऐसे कार्य से प्रेरित होकर अपने करने का मूल काम याद करते जाएँगे।
तुम्हें शायद विश्वास न हो, पर तुम लोगों जितना विश्व-मानवता की शांति और पृथ्वी के कुशल-क्षेम की प्राणपण से प्रार्थना करने वाला कोई नहीं, इसलिए उस अभूतपूर्व उपलब्धि से रिसने वाली उच्च आभा को छूने वाला व्यक्ति दिव्यता क्या है यह बोध पाकर, अपने में भी प्रकट करूँ, ऐसा स्वाभाविक रूप से सोचकर व्यवहार करने लगता है।
इस साल मई में धार्मिक लोगों की दिव्यता का पुनर्जागरण पूरा हुआ।
और संगठनों से न जुड़कर व्यक्तिगत रूप से सक्रिय, सच्ची धार्मिक भावना वाले लोगों ने भी तुम लोगों के साथ हाथ मिलाकर काम करने की इच्छा जताना शुरू किया है।
शांति की प्राप्ति की ओर के ऐसे सब मोड़ हर व्यक्ति के संरक्षक देवताओं और आत्माओं के मार्मिक प्रयास से ही हैं, यह सत्य भी तुम लोग जान लो।
क्योंकि हर मोड़ आकाश, धरती और ब्रह्मांड के महान सामंजस्य की सिम्फ़नी के साकार होने का रूप है। (समाप्त)






