स्त्रीत्व और पुरुषत्व को एक करने के लिए (मध्य भाग)
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(पिछली बार से जारी)
★प्रकट संसार के अटल नियम को ध्यान में रखो

इसीलिए, प्रकट संसार के तथ्यों की ओर भी नज़र रखते हुए चलना, आत्मा के विकास के लिए महत्वपूर्ण है।
और अगर स्त्री-पुरुष हमेशा अलग-अलग जीवों की तरह बिखरकर जीते रहें, तो उसमें आत्मा का कोई विकास नहीं होगा।
जैसा अभी कहा, मनुष्य, स्वयं जीवन के रूप में, भीतर दोनों लिंगों को धारण करने वाला अस्तित्व है।
लेकिन भौतिक शरीर के रूप में, जीवन स्त्री और पुरुष में बँटकर प्रकट हुआ है, इसलिए पुरुष अकेले बच्चे को गर्भ में धारण नहीं कर सकता, और उल्टा स्त्री भी अकेले बच्चे को जन्म नहीं दे सकती न।
स्त्री-पुरुष के आपस में मिलने से स्त्री जीवन को गर्भ में धारण करके जन्म देती है, यह प्रकट संसार का अटल नियम है, और यह आत्मिक लोक में भी देवलोक में भी, दूसरे तारों के संसार में भी, कहीं भी जाओ, वैसा ही है।
मनुष्य, हर तारे के देवलोक से भी ऊपर चमकने वाले केवल प्रकाश के संसार तक जाकर, पहली बार वहाँ दोनों लिंगों वाले एकीकृत अस्तित्व का सार प्रकट कर सकता है।
इसलिए, तुम अभी जहाँ हो वह भौतिक लोक हो, आत्मिक लोक हो या देवलोक, जब तक दृश्य जगत में जी रहे हो, मनुष्य को हर एक के स्त्री-पुरुष में बँटकर प्रकट होने के तथ्य को स्पष्ट रूप से ध्यान में रखकर, अपनी भूमिका पूरी करनी होगी।
यहाँ तक की बात समझ आए, तभी अगले चरण में जा सकते हो।
वह, जैसा अभी थोड़ा बताया, पुरुष और स्त्री दोनों के अपने भीतर समाए दोनों लिंगों के गुणों को, पुरुष या स्त्री होते हुए भी, प्रकट करते जाने का चरण है।
★स्त्रीत्व और पुरुषत्व के एकीकरण की ओर पहला कदम

पुरुष के गुण, स्त्री के गुण, पुरुष की कमियाँ, स्त्री की कमियाँ, इनमें से हर एक के बारे में कभी सोचा है?
भीतर के स्त्रीत्व-पुरुषत्व को, तुम स्त्री हो या पुरुष इसकी परवाह किए बिना, एक मनुष्य के रूप में एक करने के लिए, उन गुणों और कमियों को स्पष्ट रूप से पहचानकर, वस्तुनिष्ठ रूप से देख सकना ज़रूरी है।
नहीं तो, पुरुष हमेशा पुरुष होने से चिपका रहता है, और स्त्री हमेशा स्त्री होने से चिपकी रहती है, और हर एक की कमियों को ही मनुष्य का मानक समझने की ग़लतफ़हमी में, दोनों लिंग एक-दूसरे को समझ नहीं पाते, और भीतर के दोनों लिंगों के एकीकरण तक नहीं पहुँच पाते।
अब तक के संसार को, मोटे तौर पर सामान्य रूप से बाँटकर देखें तो, पुरुष में अग्रणी होकर नई राह खोलने की भावना प्रबल थी, और स्त्री रक्षा करने में निपुण थी न।
यह लंबे समय तक चलने वाले संसार में हर एक की कमी बन गई, और पुरुष ताक़तवर होने के कारण आक्रामक होकर दूसरों को घुटनों तले दबाने की कोशिश करने लगा, या इलाक़े छीनने जैसी बात होने लगी, और स्त्री को कहने लायक बात भी न कह पाकर, कठिन स्थिति सहने पर मजबूर किए जाने वाला पहलू भी रहा।
यह केवल सामान्य बात है, इसलिए ग़लत मत समझना।
उस ढाँचे में न समाने वाले स्त्री-पुरुष भी हैं, यह भी तथ्य है, लेकिन अभी इतिहास की गहराई को भी जोड़कर, समग्र प्रवृत्ति समझाने के लिए बात कर रहे हैं, इसलिए पूरे को ऊपर से देखने वाले भाव से, छोटे अंतरों पर अटके बिना बड़ी समानता को देखो।
वहीं से हर एक के चलने योग्य मार्ग दिखने लगता है।
उदाहरण के लिए, आक्रामकता की ओर झुका पुरुष भीतर के मातृत्व को जगाने की कोशिश करे, या अग्रणी भावना की कमी वाला कोमल हृदय पुरुष साहस विकसित करके अपने और परिवार के जीवन का रास्ता खोले।
स्त्री हो तो, अभी की बात में “पुरुष” वाले हिस्से को स्त्री से बदलकर देखो।
इस तरह सोचते जाओ, तो तुम किस प्रवृत्ति वाले इंसान हो, किसमें निपुण हो, और किसकी कमी है, यह दिखने लगता है न। (अगली बार जारी)






