देवलोक में स्थित दिव्य-देह की चेतना को गुँजाने के लिए
प्रकाशित अद्यतन
★”न चाहे गए भावों के वश में” रहने से आगे बढ़ने के लिए
आज हमेशा से थोड़ी, सार के और क़रीब की गूँज वाली बात करते हैं।
भौतिक मनुष्य की महसूस की जाने वाली भावनाओं में, दुख, दर्द और पीड़ा जैसे नकारात्मक विचार-स्पंदन होते हैं न।
बहुत से लोग उन भावनाओं की लहरों में घसीटे जाते हुए जीते हैं, और अपना ही मन होते हुए भी उसे मर्ज़ी से नहीं सँभाल पाते।
यह, बहुत से लोगों का “मनचाहे भावों के अनुसार” नहीं, बल्कि “न चाहे गए भावों के वश में” मन से झकझोरे जाने का रूप है, और पृथ्वी-लोक के पूर्ण शांत तारे में पूरी तरह परिवर्तित न हो पाने की स्थिति का मूल कारण है, लेकिन तुम अपने मन को टकटकी लगाकर निहारकर देखो, क्या तुम्हें लगता है कि भावनाओं का स्वतंत्र रूप से उपयोग करते हुए जी रहे हो?
या भावनात्मक विचारों से झकझोरे जाते हुए समय बिता रहे हो?
आज ख़ासकर, भावनाओं का स्वतंत्र उपयोग न कर पाने वाले लोगों के लिए बात करेंगे, लेकिन रोज़ जो चेतना छोड़ते और चलाते हो, वह किस आयाम की चेतना है, यह परख सकने लगो तो अच्छा है।
क्योंकि जैसा हमेशा कहते हैं, मनुष्य की चेतना में आयामों की गहराई है।
मोटे तौर पर कहें तो, उदाहरण के लिए, भौतिक शरीर से बिल्कुल चिपके विचार या अवचेतन की परत वाले सूक्ष्म लोक के विचार होते हैं न।
ऐसी भौतिक मनुष्य वाली धारणा को पार करने पर, आत्म-देह की चेतना या दिव्य-देह की चेतना, और उससे भी भीतर, स्वयं जीवन की प्रकाश-चेतना आदि भी हैं।
मनुष्य, अगर उसकी चेतना सौ-कुछ सेंटीमीटर लंबा, दसियों किलो वज़न वाला ठोस पिंड मानने वाली मनुष्य-धारणा से परे वाले आयाम (आत्मिक लोक से ऊपर के संसार) में हो, तो वास्तव में हर कोई, हर तरह की पीड़ा से मुक्त हो सकता है।
लेकिन अगर ऐसी सच्ची मनुष्य-धारणा याद न आई हो, तो उस व्यक्ति की चेतना भौतिक शरीर या सूक्ष्म देह के आयाम में हवा में तैरती भटकती रहती है, और दर्द, दुख, क्रोध या पीड़ा महसूस करने वाले “भाव स्वयं” को ही “मैं” मान बैठती है।
इसी से पीड़ा होती है।

★जीवन के मूल के प्रकाश के रूप में जीने के लिए
मन की ऐसी वास्तविकता को शांति से निहारकर परखो।
इसके लिए, शायद अब तक कान पक गए होंगे, लेकिन रोज़ की श्वास को धीमी लय में गुँजाना अच्छा है।
श्वास धीमी रखो, तो चेतना स्वयं ब्रह्मांड की गूँज में लौटती जाती है।
ऐसा होने पर, भावनाओं को उलट-पलटकर छटपटाए बिना भी, स्वाभाविक रूप से स्थिर चेतना-अवस्था बन जाती है।
कोई कठिन बात होने पर, “अरे, श्वास। श्वास धीमी करूँ” सोचने वाले लोग बहुत हैं, लेकिन कुछ न होने पर धीमी, शांत श्वास बनाए रख सकने वाले लोग अनुमान से कम हैं।
वही कुछ न होने वाला समय ही महत्वपूर्ण है।
ऐसे समय चेतना अनजान अवस्था में होती है, और श्वास उथली होने लगती है न।
ऐसे समय सचेत रूप से धीमी, शांत श्वास लेने से, रोज़ के प्रयास और साधना फल देते हैं।
हर बात रोज़ के जोड़ से ही बनती है, इसलिए जागते हुए पूरे समय, धीरे श्वास लो।
ऐसा करो तो, जीवन के मूल का प्रकाश सतही चेतना तक पहुँचकर, देवलोक में स्थित दिव्य-देह की चेतना से समय बिता सकने लगोगे।






