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तारों के साथ संवाद के युग का द्वार खोलने के लिए

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

Voice of Space Brothers

जीवन के अपने घर लौट चलें-5

प्रकाशित अद्यतन

(पिछली बार से जारी)

दृश्य जगत को अस्तित्व देने वाली चीज़ ~ बुद्ध सच में क्या बताना चाहते थे

“दूसरे हैं। लेकिन सच में नहीं हैं।
है तो केवल मेरी चेतना।”

इस पर जो हाँ कह सके, वह पहले ही सारे आयामों के आर-पार जाने वाले संसार के सिद्धांत के बारे में ज्ञान पा चुका व्यक्ति कहा जा सकता है।

जो न समझें, उनके लिए शब्दों को थोड़ा भौतिक मन के पास लाकर आसान करके बताता हूँ।

ठीक है?

“दूसरे क्या सोचें, कहें और करें, वह मुझमें दखल नहीं देता।
क्योंकि वह सब किसी भी तरह मेरे सार को हानि नहीं पहुँचाता।
इसलिए कहा जा सकता है कि ‘दूसरे नहीं हैं’।
है तो केवल वह विचार जो मैंने दूसरों के प्रति महसूस करके प्रतिक्रिया में किया, और वह दृष्टि जो मैंने ‘जीवन के प्रकाश’ से रची कि मैं ऐसा होना चाहता हूँ।
इसलिए, मेरा संसार मैं ही रच रहा हूँ।”

ऐसा सोच सकने वाला व्यक्ति, आगे चलकर धरती पर उतरने वाले दिव्य सभ्यता के युग में, जीवन की शक्ति का मनचाहा उपयोग करके, चमकती नियति रच सकने वाला व्यक्ति है।

“दूसरे क्या सोचें, क्या कहें, क्या करें, उससे मेरा कोई लेना-देना नहीं।” ऐसा पक्के तौर पर कह सकने वाले शायद अभी कम हों।

क्योंकि बहुत से लोग अपनी आत्म-चेतना का अधिकार अनजाने में दूसरों को सौंप देते हैं।

“अपनी आत्म-चेतना का अधिकार दूसरों को सौंपना” किसे कहते हैं, समझते हो?

वह अपनी नियति की “निर्माता की ज़िम्मेदारी” दूसरों पर डालकर, अपनी ज़िम्मेदारी छोड़ देने का रूप है।

इस तथ्य को ध्यान में रखकर, अपने समेत संसार पर नज़र डालो।

वस्तुगत तथ्य के रूप में, नियति रचने की ज़िम्मेदारी अनजाने में दूसरों को सौंप देने वाले व्यक्ति, संगठन और देश बहुत हैं, है न।

यह ऐसा है जैसे अपनी पाक-कला को ताक पर रखकर, “मेरा बनाया खाना तुम्हें स्वादिष्ट नहीं लगता, तो इसलिए कि तुम्हारी जीभ ख़राब है” कहकर सामने वाले को दोष देना।

इस तरह बेतुके ढंग से ऊपर रहने की कोशिश करके, मान लो बात अपनी मर्ज़ी के अनुसार चल भी गई, तो वह सूदख़ोर से पैसे उधार लेकर मनचाहा करने जैसा है, इसलिए बाद में वह थोड़ा-थोड़ा करके लौटाना पड़ता है।

कहते हैं न, उत्थान और पतन संसार की रीत है। बात यही है।

यह “जब चेतना-स्तर भौतिक शरीर से बुरी तरह चिपका हो तब ऐसा होता है” वाली बात है, और आत्म-देह या दिव्य-देह की चेतना को भौतिक शरीर में प्रकट करके जीने वालों से इसका कोई संबंध नहीं।

तथ्य को तथ्य के रूप में देखना

इसलिए तुम्हें किसी चीज़ से डरने की ज़रूरत नहीं।

तुम्हारा मन सीधे जीवन के स्रोत से जुड़ा है, और कभी-कभी स्मृतियों में बह जाते हो, पर तुम तुरंत जीवन के सार की ओर उन्मुख मन पर लौट आते हो।

ऐसे ही तुम्हारे आगे, सब कुछ संभव बनाने वाली सृजनशीलता से भरा भविष्य फैला है।

तथ्य को केवल तथ्य के रूप में, भावनाएँ मिलाए बिना देख सको, तो कहा जा सकता है कि तुम्हारी चेतना ऊपर से देखने वाली दृष्टि पर खड़ी है।

यह, पहले भी कहा था, एक आयाम ऊपर, भीतर के आयाम वाले अपने स्व पर लौटकर, उसे प्रकट करके जीना है।

जीवन का अपना घर उससे कुछ चरण और भीतर है, लेकिन जब तक वह जीने का ढंग अपनाए रहो, स्वयं जीवन वाले स्व में लौटना केवल समय की बात है।

इसलिए तुम बस जीवन में निहित ज़बरदस्त शक्ति के प्रति स्वाभाविक रूप से सजग होकर उसे प्रकट करने का अभ्यास करते रहो।

उसके लिए, धीमी और आरामदायक साँस और पूर्ण कृतज्ञता के मन को स्थायी रूप से अपने में बसाने का अभ्यास करना अच्छा है।

बस ऐसा करते रहो, तो दिव्यता को ज़बरदस्ती प्रकट करने की कोशिश किए बिना भी, वह अपने-आप मन की गहराई से रिसकर बाहर आने लगती है।

तथ्य को तथ्य के रूप में तटस्थ होकर देखना केवल इस संसार के रूप पर ही नहीं, बल्कि अपने मन की असलियत को केंद्र में रखकर देखना अच्छा है, यह बात मत भूलना।

क्योंकि, कितनी भी बार कहूँ, भौतिक शरीर के बाहर के संसार में अटककर खलबली मचाने वाले विचार, अपने और अपने संबंध को सीधे-सीधे दिखाते हैं।

अपना भीतर सँवर जाए, तो मनुष्य दूसरों या संसार के कारण मन अशांत करना बंद कर देता है।

इसलिए अगर तुम्हारी भावनाएँ अशांत हों, तो मान लो कि उसका कारण यह है कि तुम्हारे भीतर के लोग असामंजस्य की अवस्था में हैं।

और उस तथ्य को देखो।

इस तरह भीतर के ब्रह्मांड में सामंजस्य वाला संसार बनाते जाओ, तो तुम जीवन के अपने घर लौट चुकी चेतना के साथ, इस संसार में शांति लाने वाले दूत बनोगे।

(समाप्त)

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

Angelusbell

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वीडियो एक-एक करके जारी किए जाएँगे।

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