एक आदमी का जीवन (पूर्वार्ध)
प्रकाशित अद्यतन

★एक आदमी के जीवन से सीखें
आज एक आदमी के जीवन को, पुरानी कहानी की तरह सुनाते हैं।
यह ज़रूर तुम्हें स्वयं समझ पाने में प्रेरित करेगी, और तुम्हें अपने को क्षमा करने और प्रेम करने में, और जीवन के प्रकाश के साथ एक होने में मदद करेगी।
【बहुत-बहुत पहले की बात है, किसी जगह एक नौजवान रहता था, जो मानो न्याय-भावना का जीता-जागता चित्र था।
वह अपने मन में रचे “आदर्श” से हटने वाली हर चीज़ पर फ़ैसला सुनाता, आलोचना करता, नंबर देता, और आख़िर में कठोर निंदा में डूब जाता।
“तुम सामने वाले का ख़्याल करके काम क्यों नहीं करते!”
“ऐसा कहते हो, पर तुम भी तो लगभग वैसे ही हो”
“क्या! तुम्हें मुझसे ऐसा कहने का कोई हक़ नहीं”
हर बात में यही रवैया था, इसलिए उसके आसपास झगड़े कभी ख़त्म नहीं होते थे।
वह मानता था कि ऐसे काम ही वह “न्याय” हैं जो उसे करना चाहिए, और उसे इस पर ज़रा भी संदेह नहीं था।
उसमें आत्मविश्वास भरा था, इसलिए शुरू में उसके आसपास बहुत से लोग उसे चाहते थे और इकट्ठा होते थे।
लेकिन धीरे-धीरे, समय बीतने के साथ, उसके आसपास से एक-एक करके लोग चले गए।
कोण बदलकर देखो, तो वह स्वयं लोगों को धकेलकर दूर करते हुए, अकेलेपन की चोटी की ओर जा रहा था।
तीस साल, चालीस साल, इस तरह जीवन के पन्ने पलटते-पलटते, वह आख़िरकार बिल्कुल अकेला हो गया।
और जल्द ही, वह बीमार पड़कर बिस्तर पकड़ बैठा।
उस समय मदद करने वाला कोई नहीं था।
एक दिन, वह टूटती साँसों के साथ, तड़पते हुए बीमारी के बिस्तर पर, एक सपना देखता है।
वह ऐसे संसार का सपना था, जिसमें बिस्तर पर पड़े उसके चारों ओर सब कुछ दर्पणों से मढ़ा हुआ था।

★दर्पणों से मढ़े संसार में
वहाँ, वह कोई विचार छोड़ता, तो दर्पण में दिखने वाला वह स्वयं इस ओर, वही शब्द उस पर बरसा देता।
वह जो विचार छोड़ता था, वे सब दूसरों की आलोचना और बुराई जैसे ही थे, और वे सब हर कोण के दर्पणों के उस पार वाले उसके अपने रूप से, बिस्तर पर पड़े उस पर बरसाए जा रहे थे, तो सहा कैसे जाता।
उसे बुरा लगने लगा, और उसने रज़ाई में सिर छिपाकर सोचा।
“मुझे दूसरों से ऐसी ही बातें क्यों सुननी पड़ती हैं”
बेचैन होकर सोचते हुए उस समय में, उसे अचानक लगा।
“अरे, मैंने अतीत में जो शब्द छोड़े, वे सब जिस पर छोड़े उस तक नहीं, बल्कि मेरे ही पास लौट रहे थे”
“मेरा कष्ट इसलिए भी था कि मेरे अपने शब्दों का ज़हर मेरे ही मन को खा रहा था”
यह सोचते ही, उसका मन देखते-देखते हल्का होता गया।
और, वह जो विचार छोड़ता था, वे धीरे-धीरे आत्म-चिंतन वाले बनते गए।
“अरे, दूसरे कुछ भी सोचें, कुछ भी कहें, कुछ भी करें, वह सब मुझे हानि पहुँचाने वाला नहीं था”
“महत्वपूर्ण बात यह थी कि दूसरों के विचार, वचन और कर्म के प्रति मैं क्या सोचता हूँ”
“और वह, मेरे अपने किए काम, या जिन बातों पर मैं अड़ा था……, यानी असामंजस्य वाली बातों पर ध्यान दिलाने वाला अवसर था”
“उसे अपनी बात न मानकर, अपनी बात को ताक पर रखकर, मैं उसे दूसरों की बात मान बैठा था”
“बाहर देखी-सुनी बातों और दूसरों के बारे में जो मैंने सोचा, उसे अपनी ओर मोड़कर, अपने को जान लेना, बस इतना ही काफ़ी था”
“केवल इतना ही काफ़ी था” (अगली बार जारी)






