असेंशन (आयामी उत्थान) कर चुकी चेतना को स्वाभाविक मान्यता बनाने के लिए-9
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
ऊपर से देखने वाली चेतना-दृष्टि तक पहुँचने की सबसे उपयुक्त घड़ी
मन का विकास आगे बढ़ता है, तो “तथ्यों पर प्रतिक्रिया करने वाली ‘शरीर से चिपकी भावना'” पतली होने लगती है, और उसकी जगह “सब तथ्यों को ऊपर से देखने वाली ‘ब्रह्मांड से सीधे जुड़ी चेतना'” धीरे-धीरे फिर से जागने लगती है।
“जल्दी से सच्चे स्व में लौटना चाहता हूँ” कहकर कुछ लोग एक दिन में आत्म-परिवर्तन चाहते हैं, लेकिन जीवन “लंबे रास्ते पर चलने जैसा” है, और कोई आसान रास्ता नहीं होता।
एक जीवन ऐसा बना है कि उसमें बचपन, किशोरावस्था, युवावस्था, मध्य आयु, प्रौढ़ावस्था और बुढ़ापा, इन तरह-तरह की अवस्थाओं का अनुभव करते हुए “जन्म लेने का उद्देश्य” पूरा किया जाए।
उसके भीतर हर कोई, चेतन हो या न हो, आत्मा के एकीकरण और सामंजस्य की ओर की यात्रा पर चल रहा है।
ऊपर से देखने वाली चेतना-दृष्टि में रुचि रखने वाले अभी के तुम्हारी आयु किसी भी अवस्था की हो, सारे पिछले जन्मों और इस जन्म की सब अवस्थाओं में हुए तथ्यों को एक नज़र में वस्तुनिष्ठ रूप से देखने के लिए, न बहुत जल्दी है न बहुत देर।
जिस पल तुम्हारी चेतना सार्वभौमिक सत्य के सामने सीधी खड़ी हुई, वही सबसे उपयुक्त घड़ी है।
बहुत से लोग मानते हैं कि केवल इस जन्म के प्रयास और साधना से ही कुछ पूरा होता है या इच्छा पूरी होती है।
लेकिन मनुष्य की आयु “शरीर की आयु और आत्मा की आयु” से तय होती है, इसलिए कुछ लोगों का युवावस्था में खिलना और कुछ का बुढ़ापे में खिलना स्वाभाविक ही कहा जा सकता है।
और जैसा पहले कहा, मनुष्य की आत्मा सात मनों के पूरी तरह घुल-मिलकर एक होने से बनती है।
इस अर्थ में, जिस अपने आप को तुम अपना आप मानते आए, वह सच्चा अपना आप नहीं, इसलिए एक कदम पीछे हटकर बस तथ्य देखो, यही चाहता हूँ।
यहाँ जो बात सच में समझ लेनी है, वह यह कि इस कारण, अपने और दूसरों की तुलना करके ऊपर-नीचे, जल्दी-देर जैसे तुलनात्मक निर्णय सुनाना निरर्थक है।

जिसके लिए सबसे उपयुक्त घड़ी आ गई है, उस तुम्हारे नाम
अगर तुम्हें अंतर्ज्ञान हुआ कि अभी चेतना के विकास की सबसे उपयुक्त घड़ी आ गई है, और ऊपर से देखने वाली चेतना-दृष्टि के क्षेत्र का द्वार आँखों के सामने है, तो उतावले होकर जल्दी से द्वार के भीतर जाने के लिए दरवाज़े के हैंडल पर हाथ रखने से पहले, तुम्हें एक बात की ज़रूर सलाह देना चाहता हूँ।
वह यह कि अभी तुरंत सब कुछ ऊपर से देखने की कोशिश करने के बजाय, वर्ष-दर-वर्ष, महीने-दर-महीने, दिन-दर-दिन, घंटे-दर-घंटे, मिनट-दर-मिनट, सेकंड-दर-सेकंड, पल-दर-पल, इस तरह सारे अतीत और भविष्य को कसकर, कसकर, कसकर, कसकर, कसकर, कसकर, कसकर इस पल में समेट दो।
यह बहुत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, और इसके बिना आयामों की गहराई समेत बर्ड्स-आई व्यू आत्मसात नहीं किया जा सकता।
उलटे कहें, तो सही-सही इन चरणों से होकर “ऊपर से देखने वाली चेतना-दृष्टि के क्षेत्र का द्वार” खोलो, तो केवल इस जन्म का सपाट जीवन ही नहीं, कई आत्मिक धाराओं समेत सारे पिछले जन्मों की स्मृतियाँ, और पृथ्वी पर आने से पहले दूसरे ग्रहों पर तरह-तरह से सक्रिय रही दिव्य-आत्मिक चेतना, इन्हें एक साथ, हथेली पर रखी चीज़ की तरह ऊपर से देख सकने लगते हो।
असेंशन (आयामी उत्थान) कर चुकी चेतना का स्वाभाविक मान्यता बन जाना, उस चेतना को कहते हैं जो तन-मन के आयाम के बाहरी और भीतरी पक्ष, समय के भविष्य और अतीत, सब कुछ एक पल में पकड़ सकती है।
यह समझ आता है, तो इसलिए कि तुम पुरानी, बहुत पुरानी आत्मा हो, “जीवन के बुज़ुर्ग” हो।
जीवन के बुज़ुर्गों ने हर प्रकार के अनुभव……, सुखद भी और दुखद भी, आनंददायक भी और क्रोध दिलाने वाले भी, पीड़ित होना भी और पीड़ा देना भी, स्त्री का जीवन भी और पुरुष का जीवन भी, अमीरी का अनुभव भी और ग़रीबी का अनुभव भी, मोटे व्यक्ति के रूप में भी और दुबले के रूप में भी, कम आयु वाला जीवन भी और लंबी आयु वाला जीवन भी, खट्टा भी और मीठा भी, सब अनुभवों का स्वाद पूरा चख लिया है।
इसलिए तरह-तरह के लोगों के तरह-तरह के विचार, वचन और कर्म को रंगीन चश्मे से देखे बिना, केवल तथ्यों के संबंध को शांति से देख पाते हैं, यही बात है।
“मुझे अभी समझ नहीं आया” ऐसा लगे, तब भी चिंता मत करो, कोई समस्या नहीं।
जल्दी या देर, यह तो ब्रह्मांड की दृष्टि से उन्नीस-बीस का फ़र्क है, और अनंत जीवन की दृष्टि पर खड़े हों, तो चिंता करने का कारण भी नहीं।
इसलिए जैसे हो वैसे अपने आप को क्षमा करते और प्रेम करते हुए, जैसा है वैसा होने तक पहुँचने की प्रक्रिया का आनंद लो।
(समाप्त)






