पृथ्वी की शांति और आत्मिक स्तर का उत्थान (4/7)
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
आत्मा की चौड़ाई बढ़ाकर आत्मिक स्तर के उत्थान के लिए
जिन्हें तुम “अंतरिक्ष के भाई” कहते हो, हमारा संसार भी ऐसी ही आयाम की गहराई के एक कोने में मौजूद है, और वह तुमसे कटा हुआ कोई बिल्कुल अलग लोक का अस्तित्व नहीं है।
आत्मिकीकृत संसार भौतिक दूरी से परे होता है, इसलिए वास्तव में ब्रह्मांड के उस पार स्थित आत्मिकीकृत आकाश-धरती से भी, बस तरंग मिल जाए, तो तुम अभी वहीं रहते हुए भी संवाद कर सकते हो।
इस अलग आयाम वाले संसार में आने-जाने को आसानी से समझाऊँ तो……, हूँ……, हाँ, जैसे जापानी घर में फ़ुसुमा (सरकने वाला दरवाज़ा) खोलो तो आसानी से बगल के कमरे में जाया जा सकता है न?
ठीक उसी तरह, “चेतना को सहज ही जीवन की गहराई में एकाग्र करो तो जाया जा सकने वाला संसार,” ऐसा कहूँ तो समझ में आएगा?
दूसरे शब्दों में, आँखें बंद करके मन को एकाग्र करो, और आँखें खोलो तो तुम्हारा संसार किसी और संसार में बदल चुका हो, ऐसी बात है। (※ उस समय का शरीर उस आयाम का स्पंदन-पिंड है। उदाहरण → आत्म-देह या दिव्य-देह आदि)
लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि जिस संसार में तुम जाना चाहते हो उसकी तरंग तुम्हारी आत्मा के स्पंदन-क्षेत्र (प्रकाश-वृत्त) की सीमा के भीतर हो।
इसके लिए अपने आत्मिक स्तर को, किसी एक निश्चित बिंदु पर रुककर संतुष्ट होने के बजाय, असीम रूप से गहरा और ऊँचा करते जाना होगा।

समझने में आसान ऊपर-नीचे के विभाजन से समझाऊँ तो, अगर अभी किसी व्यक्ति का आत्मिक स्तर सूक्ष्म लोक के ऊपरी भाग में है, तो वह नरक जैसे अंधकार के संसार में आसानी से आ-जा सकता है, लेकिन आत्मिक लोक या देवलोक जैसे सूक्ष्म स्पंदन के संसार में प्रवेश नहीं कर सकता।
और अगर अभी किसी व्यक्ति का आत्मिक स्तर आत्मिक लोक के मध्य भाग में है, तो वह उस संसार से नीचे के संसार में आ-जा सकता है, लेकिन उस स्पंदन-क्षेत्र से ऊपर के संसार, आत्मिक लोक के ऊपरी भाग या देवलोक आदि में प्रवेश नहीं कर सकता।
और अगर अभी किसी व्यक्ति का आत्मिक स्तर देवलोक के निचले भाग में है, तो वह उस संसार और उससे निचले स्तरों के संसार में आ-जा सकता है, लेकिन और गहरे आयाम में स्थित देवलोक के ऊपरी संसार में प्रवेश नहीं कर सकता।
इसके अलावा, एक ही आत्मिक स्तर पर होने पर भी, अगर क्षैतिज तरंग अलग हो, तो भी उन संसारों में प्रवेश नहीं किया जा सकता।
ऐसी पृष्ठभूमि वाले लोग जब भौतिक लोक में मिलते हैं, तो एक-दूसरे को स्वीकार न कर पाने की भावनाएँ उठती हैं और विकर्षण महसूस होता है।
एक-दूसरे के अंतर को स्वीकार और सम्मान कर पाना या नहीं, यह ऐसा है कि यह आत्मिक स्तर जितना ऊँचा हो, और क्षैतिज फैलाव का दायरा जितना बढ़ता जाए, उतना ही एक-दूसरे के अंतर को स्वीकार किया जा सकता है, और व्यक्ति अधिक बड़े हृदय वाला बनता जाता है। (अगली बार जारी)






