सच्ची खुशी
प्रकाशित अद्यतन
★सच्ची खुशी को जानने के लिए
पृथ्वी के लोगों के मन की अवस्था देखता हूँ, तो कहा जा सकता है कि “सच्ची खुशी क्या है”, खुद को जीवन के सार से बाँधे रखने वाला यह प्रश्न भूल जाने पर, मनुष्य भटकाव के संसार में गिरकर अपने आप (अपने भीतर के ईश्वर) को खो बैठता है।
इस अर्थ में, दिव्यता पूरी तरह फिर से जाग उठे उस समय तक, यह प्रश्न खुद से पूछते रहना ही अच्छा है।
“सच्ची खुशी क्या थी?”, यह हर मौके पर याद करके, खुद को सार्वभौमिक सत्य में डुबोए रखो।
इसके लिए, सच्ची खुशी क्या है, यह अच्छी तरह समझना ज़रूरी है।
क्या तुम उस प्रश्न का बिना एक पल गँवाए उत्तर दे सकते हो?
अगर “हम्म, अरे…” करके सोचे बिना उत्तर न निकले, तो अभी जीवन के सत्य को खोल नहीं पाए हो, इसलिए अपने सत्य को प्रकट करके, अपना आप (अपने भीतर का ईश्वर) बनने का लक्ष्य रखो।
और सच्ची खुशी जीवन के सत्य पर आधारित मानसिक चीज़ है, यहाँ तक तो समझ आता है न।
समस्या उसके आगे की है।
मन आँखों से नहीं दिखता।
हाथ से छुआ भी नहीं जा सकता।
इसलिए वह कैसी चीज़ है, यह अस्पष्ट हो जाता है, और बहुत से लोग उसे धुँधली, पकड़ में न आने वाली चीज़ मान बैठे हैं।
ऐसा इसलिए कि चेतना पर्याप्त रूप से शांत नहीं हुई, इसलिए चेतना को निचले दांतियन में मज़बूती से उतारकर, तन-मन को स्थिर करो।
इसके लिए साँस का धीमा, सहज और गहरा होना ज़रूरी है।
क्योंकि जिनकी रोज़ की साँस उथली है, उनकी चेतना भौतिक शरीर या सूक्ष्म देह से चिपकी रहती है।

★सच्ची खुशी क्या है
तो, कुछ लोग ज़रूर जानना चाहते होंगे कि सच्ची खुशी कैसी चीज़ है, लेकिन शारीरिक जीवन से जुड़ी खुशी के हिस्से के बारे में सही उत्तर यही है कि वह व्यक्ति-व्यक्ति में अलग होती है, इसलिए ठोस रूप से “यह-यह है” ऐसी व्याख्या नहीं की जा सकती।
शरीर से परे होकर आत्मिकता और दिव्यता के चरण में आओ, तो धीरे-धीरे सब एक ही स्रोत के निकट पहुँचते हैं, इसलिए उसका स्वरूप एक-दूसरे से मिलता-जुलता हो जाता है।
इसका क्या अर्थ है, तो ऐसी मनोदशा बनने लगती है कि दूसरों की खुशी और अनेक अस्तित्वों की खुशी ही अपनी खुशी और आनंद है।
वहाँ अपनी सुविधा के घुसने की कोई गुंजाइश नहीं।
सार यह है कि यह अहं के पतले पड़ चुके मन की अवस्था है।
इसके सबसे निकट है माँ का बच्चे के प्रति प्रेम।
बहुत-सी माताएँ अपने बच्चे के लिए सोचकर जो विचार, वचन और कर्म करती हैं, वह निःस्वार्थ प्रेम को साकार करता है, है न।
बच्चा खुश है तो बस, अपने बच्चे की खुशी ही मेरी खुशी है, इस भावना में वे अपनी किसी चीज़ को दबाकर, खुद को बलिदान करके ऐसा नहीं कर रहीं, बल्कि बच्चे के लिए मन और शरीर को काम में लगाना ही सीधे उनकी अपनी खुशी बन जाता है, है न।
अगर सब लोग हर प्रकार के अस्तित्व के प्रति इसी तरह चेतना को काम में लगाएँ, तो पृथ्वी एक ही झटके में शांतिपूर्ण ग्रह बन जाएगी।
इस अर्थ में, कहा जा सकता है कि सच्ची खुशी ईश्वरीय मन में है।
दिव्यता फिर से जाग उठे, तो ऐसा मन ज़बरदस्ती नहीं जगाना पड़ता, बल्कि स्वाभाविक रूप से ऐसा हो जाता है।
तुम लोगों में ऐसा मन जागने लगा है, इसलिए ख़ास तौर पर कुछ विशेष न भी करो, बस अभी जैसे हो वैसे ही रहते हुए पृथ्वी को घेरे रहो और मानवता को गले लगाए रहो।
ऐसा करो, तो सच्ची खुशी को अपना बना सकते हो।






