पवित्रता पर आधारित आत्म-स्वीकृति
प्रकाशित अद्यतन
सकारात्मक सोच का नारा देने वाले लोगों के बीच पसंद से इस्तेमाल होने वाला एक शब्द है, “आत्म-स्वीकृति” न।
इसे, लोगों के उजले मन से जीने के लिए, अनिवार्य चेतना-सूचक माना जाता है।
लेकिन, हर किसी का बस “मैं ऐसा ही ठीक हूँ” कहना, क्या सचमुच सच्ची आत्म-स्वीकृति कहा जा सकता है?
पवित्रता के फिर से जागने का लक्ष्य रखकर जी रहे तुमसे, हम चाहते हैं कि इस बात पर गहराई से फिर से नज़र डालो।
“सच्ची आत्म-स्वीकृति…… वास्तविक आत्म-स्वीकृति आख़िर क्या है?” ऐसे।
हमेशा कहते हैं न।
“‘मैं कौन हूँ’ कहकर, जीवन के सार की खोज करो”
“मनुष्य के जीवन को चमकाकर जीने के लिए, मूल रूप से महत्वपूर्ण बात…… पवित्र और पवित्र न होने वाली भावनाओं में भेद करके, पवित्र न होने वाली भावनाओं को संरक्षक देवताओं और आत्माओं को सौंपकर, पवित्र विचारों, शब्दों और कर्मों को सक्रिय रूप से अपने भीतर प्रकट करें”
“‘मैं’ नाम के भावनाओं के छोटे ढेले को, विश्व-शांति की प्रार्थना जैसी बड़ी चेतना में अर्पित करके जियो, तो पता भी न चले और छोटी बातों पर घुटते-चिंता करते रहने की आदत (भावना की आदत) मिटती जाएगी” ऐसे।

स्वयं वास्तव में कौन है यह भी न जानकर, अपनी भावना पवित्र है या नहीं यह भी न परख पाकर, हमेशा “मैं, मेरा, मुझसे, मुझे” करते हुए आत्म-केंद्रित होकर जीते हुए, साथ ही अपने किए को स्वीकार कर लेना, चेतना के विकास में बाधा डालने वाली “न करने योग्य बात” कही जा सकती है।
इसलिए “आत्म-स्वीकृति” शब्द, हर चेतना-स्तर के व्यक्ति पर लागू होने वाला चेतना-उपयोग नहीं।
अभी कहे गए “जीवन के सार की खोज” “अपनी भावनाओं पर पीछे मुड़कर देखकर उन्हें पवित्रता के सुर में मिलाना” “विश्व-शांति की प्रार्थना जैसी बड़ी चेतना को अपनी चेतना में मानक बनाना”…… ऐसे बुनियादी चेतना-उपयोग करने वाले लोगों के लिए, “सच्ची आत्म-स्वीकृति” न टाली जा सकने वाली, चेतना की महत्वपूर्ण सीख कही जा सकती है।
मनुष्य में हर किसी के भीतर, पवित्रता पर आधारित अनंत ज्ञान और क्षमता, और हर असंभव को संभव करने वाली शक्ति बसी है।
पवित्रता पर आधारित सच्ची आत्म-स्वीकृति, तुम लोगों में वह अनंत शक्ति फिर से जगाने में, बहुत मदद करेगी।
इस बात को अपने ऊपर लागू करके, आराम से पीछे मुड़कर देखो।
तब, कभी पीछे न लौटने वाली आत्म-स्वीकृति तुम्हारी अपनी बन जाएगी।






