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तारों के साथ संवाद के युग का द्वार खोलने के लिए

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

Voice of Space Brothers

दिव्यता के पुनर्जागरण का बोध पाने के लिए

प्रकाशित अद्यतन

★आयामों में उलझे बिना, भीतर समाए सब आयामों को ऊपर से देखो

पृथ्वी के भौतिक मनुष्यों की चेतना जब तक आसक्तियों को अभी से और अधिक छोड़कर, बाधाहीन स्वतंत्र मन की अवस्था तक न पहुँच जाए, तब तक परलोक (बहु-आयामी संसार) की बातें देखना-सुनना ठीक नहीं।

क्योंकि जो लोग शरीर को ही अपना आप माने बैठे हैं, वे उच्च-आयामी संसार देखें या निम्न-आयामी संसार, अच्छे अर्थ में या बुरे अर्थ में, जो देखा-सुना उसके कारण उनकी चेतना के पाँव ज़मीन पर नहीं टिकते, और शारीरिक जीवन की उपेक्षा होने लगती है।

इसलिए अभी तो, “तरह-तरह के आयामी स्तर ऐसे हैं, और उनमें भौतिक जगत की स्थिति ऐसी है”, इस तरह केवल मोटी रूपरेखा समझ लेना काफ़ी है।

बस तुम अपनी चेतना का विकास आगे बढ़ाते रहो, तो कुछ समय में यह तथ्य भावनाओं को मिलाए बिना समझ आने का समय आएगा कि वे संसार तुमसे बिल्कुल अलग, दूर के संसार की बात नहीं, बल्कि तुम्हारे भीतर के ब्रह्मांड में फैले संसार का रूप हैं।

महत्वपूर्ण बात है, अपने भौतिक व्यक्तिगत स्व को जीवन के महा-स्व में लौटाते जाना।

ऐसा करते चलो, तो सब स्तरों के संसारों को एक पल में ऊपर से देख सकने वाली ब्रह्मांडीय दृष्टि आती जाती है।

सार यह है कि हर एक आयाम में उलझे बिना, सब आयामों को भीतर समाए ब्रह्मांडीय चेतना में लौट जाओ, बात बस इतनी-सी है।

★शरीर में रहते हुए दिव्य चेतना में जीने के लिए

तो, हर कोई खुश होना चाहकर जी रहा है, फिर भी बिना झूठ-फरेब वाली खुशी महसूस करते हुए जीने वाले कम क्यों हैं, समझते हो?

इसलिए कि वे यह जाने बिना जी रहे हैं कि मनुष्य (अपना) जीवन क्या है।

जैसा हमेशा कहता हूँ, जीते हुए महसूस होने वाली पीड़ा जीवन के सार को पूरी तरह भूल जाने से शुरू हुई।

अपने (मनुष्य के) शरीर में बसा जीवन क्या है, हम किसलिए जी रहे हैं, शरीर छोड़ चुका जीवन कहाँ जाता है, ऐसे तथ्य समझ आ जाएँ, तो पीड़ा उसी पल वहीं बिखरकर मिट जाती है, और साफ़ आकाश से बरसता जीवन के सूर्य का प्रकाश भविष्य के पूरे रास्ते को प्रकाशित कर देता है।

ऐसा होने के लिए, जीवन के सार, यानी दिव्य चेतना को फिर से जगाकर भौतिक तन-मन में उपयोग करो।

यही वह मार्ग है जिस पर पृथ्वी की मानवता साथ मिलकर उज्ज्वल भविष्य की ओर चल सकती है।

लेकिन यह जान लेने पर भी, ऐसा करना चाहने वाले अपने आप को सार्वभौमिक सत्य की ओर न जाने देने वाली एक चीज़ है।

वह है स्मृति।

चेतना के विकास में बाधा डालने वाली सब स्मृतियों को जीवन की महान आत्मा को सौंप सको, तो हमारे कहे शब्दों का अर्थ समझ आ जाता है।

जीवन की महान आत्मा तुम्हारी अपनी दिव्य चेतना है, और उसका बाहरी कार्य, यानी हायर सेल्फ़ की चेतना भी।

जिसे तुम अपना आप समझते हो उस सारी चेतना, और अतीत की सारी स्मृतियों के प्रति आसक्ति को छोड़ दो।

ऐसा करो, तो अतीत के सामान्य ज्ञान में न उलझने वाले मन में जीवन का प्रकाश बहकर आने लगता है।

इसीलिए बार-बार कहता रहता हूँ, “रोज़ की गहरी साँस के ज़रिए खुद को जीवन के मूल स्वरूप से तालमेल में लाते जाना अच्छा है।”

जिसे यह नियम समझ आ जाता है, वह एक-एक करके भौतिक मनुष्य-दृष्टि से स्नातक होकर दिव्य चेतना वाले व्यक्ति में केंचुली बदलता जाता है।

अपनी दिव्यता को फिर से जगाने के लिए, अभी मुझे क्या करना है।

यह बात हमेशा खुद से पूछते रहो।

आयामी उत्थान पा चुकी चेतना एक दिन में नहीं आती, इसलिए धीरे-धीरे, लगातार रोज़ की चेतना के आयाम को दिव्य क्षेत्र में रखकर प्रकट करने का अभ्यास करो।

बस ऐसा करते रहो, तो पता चले बिना, दिव्य मानवता के रूप में फिर से जाग चुके अपने आप का बोध होने का समय ज़रूर आएगा।

 

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

Angelusbell

वीडियो जल्द आ रहे हैं

वीडियो एक-एक करके जारी किए जाएँगे।

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