लाभ-हानि से परे निर्णय का मानदंड अपनाते जाने के लिए (3)
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
रोज़ की छोटी-सी सजगता और अभ्यास का संचय ही
हमारी दुनिया, जैसा अभी कहा, ऐसी दुनिया है जहाँ लाभ-हानि सोचे बिना जिया जा सकता है, इसलिए मेहनत से “लाभ-हानि रहित चेतना में रहें” जैसा सोचने की ज़रूरत नहीं; पर जब ऐसे स्पंदन-लोक में पूरी तरह डूबे हो जहाँ सब सोचकर जीते हैं कि लाभ-हानि सोचे बिना जिया नहीं जा सकता, तब कहने भर से तुरंत हो जाने वाली चीज़ नहीं लगती, है न।
“विश्व-प्रेम का हृदय रखकर जीओ, या मानवता के प्रति प्रेम को मूल बनाकर जीओ, कहने से क्या, यह इतना आसान नहीं,” ऐसा शायद लगे।
पर कोई कुछ भी कहे, ऐसा बनने की रोज़ की छोटी-सी सजगता और अभ्यास का संचय ही लाभ-हानि में न उलझने वाली चेतना तक पहुँचने का सबसे छोटा रास्ता है।
इसलिए “यह भी नहीं, वह भी नहीं” कहकर इधर-उधर सोचने की फ़ुरसत हो, तो वह समय पृथ्वी की शांति की एकाग्र कामना वाली महाप्रेम की प्रार्थना में लगाना अच्छा है।
बस ऐसे जीते रहो, तो न जाने कब, अनजाने में अपनी चेतना बदलती जाती है, और अचानक याद करके पीछे मुड़कर देखो तो ऐसा समय आता है जब चकित होकर कहो, “अरे? मैं अपनी सुविधा से नहीं चल रहा। लाभ-हानि के हिसाब वाला वह विचार कहाँ गायब हो गया?”

लाभ-हानि से निर्णय न करने वाला मन ही दिव्य चेतना है
दिव्यता की चेतना का अर्थ, जैसा शब्द से ही स्पष्ट है, ईश्वर के हृदय को अपना बना लेना है, है न।
तो इसका मतलब, सुविधा नहीं इसलिए दूसरों से रूखा व्यवहार करना, या मूड ख़राब है इसलिए प्रेम न करना, या इसके उलट, सुविधाजनक है इसलिए दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करना, या मूड अच्छा है इसलिए प्रेम करना, ये सब बस शरीर से चिपके भावनात्मक विचार, लाभ-हानि पर आधारित निर्णय भर हैं, यह अच्छी तरह समझ आता है, है न।
इस तरह सोचते जाओ तो यह भी समझ आता है कि सबसे बुनियादी बात है सच्चे अपने (दिव्य चेतना) और भावनाओं वाले अपने में भेद कर पाना।
ऐसा बनने के लिए भी, ईश्वर की चेतना को सतही चेतना में याद दिलाने वाली पृथ्वी की शांति की प्रार्थना करना महत्वपूर्ण है।
यह प्रार्थना करना सबसे बिना ज़ोर लगाए, स्वाभाविक रूप से मनुष्य के सार, दिव्यता को अभिव्यक्त कराने का तरीक़ा है; इसलिए उस प्रार्थनामय हृदय के साथ हमेशा रहो, तो कोई भी ज़रूर सच्चे अपने, दिव्यता (जीवन) वाले अपने को याद करके, स्वाभाविक रूप से चेतना का विकास पाए मन से रोज़ के निर्णय कर पाता है।
और एक बात और जोड़ूँ, “जो दिव्य नहीं है ऐसा मैं अब दिव्य मानवता बनूँगा” ऐसा कभी मत सोचना।
सबसे मूल महत्वपूर्ण पहचान यह सोचना है: “मैं मूल रूप से दिव्य मानवता था। पर दूसरे तारे से पृथ्वी-लोक में आकर पुनर्जन्म दोहराते हुए यह तथ्य भूल गया था, बस। अब का मैं बस उस सत्य को याद कर रहा हूँ।”
पहचान का यह परिवर्तन कोई और नहीं कर सकता, इसलिए खुद अपने से रोज़-प्रतिक्षण कहकर, मन की गहराई में सोई दिव्य चेतना को जगाएँ।
और जब सचमुच दिव्यता जागती है, तब बहुत ताज़ी सुबह के जागने जैसा, कहा न जा सकने वाला अच्छा भाव आता है, और उज्ज्वल मन से भविष्य में केवल आशा ही आशा वाली चेतना में रूपांतरण होता है।
इसलिए उस समय की प्रतीक्षा में, “ज़रूर ऐसा होगा” कहकर अपने पर विशाल विश्वास रखकर, मन की गहराई के जीवन के प्रकाश को माँजकर निकालना अच्छा है। (समाप्त)






