सत्य को अपने में उतारने के लिए (उत्तरार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
इसी नाम का पिछला लेख
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(पिछली बार से जारी)
★मैं कौन हूँ, यह जानने की प्रक्रिया
कितनी बार भी दोहराऊँ, मनुष्य को सच्चा सत्य समझ पाने के लिए, यह जानना होगा कि वह कौन है।
“मैं अभी जी रहा हूँ, क्योंकि जीवन यहाँ (इस भौतिक शरीर में) है।
तो फिर यह जीवन……, मुझे चलाने वाली यह अद्भुत शक्ति कहाँ से आई?
मैं कहाँ से आया, इस संसार में क्या करता हूँ, और कहाँ लौटूँगा?
मैं इस लोक में क्या करने के लिए जन्मा हूँ?
क्या बिना उद्देश्य, संयोग से जन्म लेना हो सकता है?
जन्म से पहले की स्मृतियाँ लेकर जन्म लेने वाले बच्चे बढ़ रहे हैं, सुना है, और वे सब एक-सा कहते हैं कि इस लोक को बेहतर बनाने के लिए, माता-पिता चुनकर जन्मे हैं।
तो, मैं भी ज़रूर किसी न किसी इरादे के साथ इस लोक में जन्मा होऊँगा।
वह क्या है, यह अभी पता नहीं, लेकिन मैं ज़रूर कोई विषय लेकर जन्मा हूँ।
पूरा जीवन लगाकर भी उसे खोजूँगा।
और बुढ़ापे में मृत्यु पास आती है।
जिस चेतना को मैं अपना ‘मैं’ मानता हूँ, वह जीवन के भौतिक शरीर से निकल जाने पर शरीर में नहीं रहती।
तब मैं कहाँ होऊँगा?……”

★अपने को निखारकर साफ़ करने की प्रक्रिया
ऐसे चिंतन को झंझट मानने के बजाय, ध्यान से करो।
क्योंकि यही सीधे-सीधे अपने आमने-सामने होना है।
ऐसा करते रहो, तो अब अगले चरण के रूप में, अपने स्वभाव को ईमानदारी से देखते जाने की प्रक्रिया में प्रवेश करते हो।
“अरे, मुझे सच में जल्दी गुस्सा आने की आदत है”
“हाँ, मुझे किसी का कुछ कहना बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होता, और कोई कुछ कहे तो मैं उस पर टूट पड़ता हूँ”
“ओह, मेरे भीतर अपने को माफ़ न करने वाले संकीर्ण विचार पड़े हैं। यही दूसरों को नापसंद करने का कारण था”
“मैं हमेशा ‘नहीं होगा, असंभव है’ कहकर हर बात छोड़ देती थी, क्या यही आत्म-सीमा कही जाने वाली विचार की आदत थी”
गिनने बैठो तो अंत नहीं, लेकिन इस तरह विचारों को ईमानदारी से देखते जाओ, तो विचार नियति के रूप में प्रकट होने से पहले ही उभर आते हैं, मन-शरीर से अलग होते हैं, और जीवन के प्रकाश की गोद में मिट जाते हैं।
इस तरह, अहं, स्वार्थ, व्यक्तिगत स्व जैसे संकीर्ण विचारों की आदतें हल्की होती जाएँ, तो धीरे-धीरे मन की गहराई से स्वयं “जीवन के प्रकाश” वाला सच्चा मन भौतिक शरीर की चेतना में उतरने लगता है, और आगे चलकर सतही चेतना केवल उजाले वाली प्रकाश-चेतना में बदल जाती है।
यह तो, कितने भी शब्द खर्च करके समझाने से ज़्यादा, अपने मन-शरीर को प्रयोगशाला बनाकर व्यवहार में लाना सबसे अच्छा है।
कोई बुरा असर नहीं होता, उलटे सब अच्छा ही अच्छा है, इसलिए न करने का कोई कारण नहीं, है न।
अगर तरह-तरह सोच-विचार करके आगे नहीं बढ़ पा रहे, तो पूरे मन से सीधे जीवन के सामने आ जाओ।
तब सारे सत्य तुम्हारी अपनी अनुभूति के रूप में, कौंध के रूप में, तुम्हारे भीतर से एक के बाद एक उमड़ते आएँगे, और सारी चिंताएँ, उलझनें, संदेह, हर तरह के बेचैन भावनात्मक विचार हल्के होकर मिट जाएँगे, और तुम केवल दिव्यता वाली चेतना को जी सकोगे। (समाप्त)






