सामग्री पर जाएँ

तारों के साथ संवाद के युग का द्वार खोलने के लिए

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

Voice of Space Brothers

आत्मा के बचपन से स्नातक होने के लिए गहन व्याख्यान (4)

प्रकाशित अद्यतन

(पिछली बार से जारी)

★स्वावलंबी आत्मा से जीने के लिए

इसलिए, सबसे पहले खुद अपने को स्वीकार करना है।

किसी भी चीज़ से पहले, खुद अपने को प्रेम करके गले लगाना है।

दूसरे मुझे स्वीकार करें या न करें, ऐसी बात से कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता, असल में।

यह कर पाना, आत्मा के स्वावलंबन नामक, 21वीं सदी में पूरी मानवता के साझा गृहकार्य को हल करने से भी जुड़ता है।

इस बार की बात की शुरुआत में कहा था न कि मूल रूप से “प्रेम बेहिचक देने की चीज़ है”, और जो देना चाहिए वह धन-सामग्री या सतही सहानुभूति-कोमलता वग़ैरह नहीं, बल्कि वह जीवन-ऊर्जा है जिससे वह व्यक्ति अपनी ही शक्ति से समृद्धि पैदा कर सके, सब कुछ रचने वाली मूल ऊर्जा को उमड़ाने वाला जीवन-स्रोत-प्रकाश है।

इस प्रेम देने वाले मन के कार्य की दिशा, सत्य के दृष्टिकोण से कहें तो, सबसे पहले अपनी ओर होनी चाहिए, दूसरों की ओर उसके बाद।

जब तक खुद अपने को प्रेम नहीं कर पाते, तब तक सचमुच दूसरों को प्रेम करना भी कठिन है, और जब तक अपने को बिना शर्त स्वीकार नहीं कर पाते, तब तक दूसरों को स्वीकार करने में भी अनजाने ही शर्तें लग जाती हैं।

इसलिए सब कुछ छोड़कर, खुद अपने को प्रेम करना ही होगा, और स्वीकार करना अच्छा है।

तब बिना शर्त (निःशर्त) दूसरों को स्वीकार करने की उदारता भी अपने में आ जाती है।

इसके लिए, शब्दों को और गहरा करके कहें तो, अपने और दूसरों की दिव्यता को स्वीकार करना महत्वपूर्ण है।

यह महत्वपूर्ण है कि तुम लोग खुद अपने प्रति स्वीकार करो कि तुम मूल रूप से पवित्र, स्वर्ग से आए जीवन के प्रकाश ही थे।

तब सच्चा प्रेम उमड़कर आता है।

सच्चा प्रेम क्या है, यह मानवीय सोच से स्नातक होकर दिव्य मानवता की चेतना बने बिना समझ नहीं आता, पर फिर भी शब्दों में कहें तो, वह सब कुछ रचने वाली मूल ऊर्जा स्वयं है, सब कुछ को जीवंत करके अस्तित्व देने वाले जीवन-स्रोत-प्रकाश का ही कार्य है।

जिस व्यक्ति में वह चेतना अभिव्यक्त हो चुकी है, वह दूसरों को प्रेम करने में भी अपनी सुविधा से पास आता या दूर जाता नहीं, और किसी को भी बिना शर्त प्रेम कर सकता है।

लोगों को दिए जाने वाले प्रेम के भी कई रूप हैं, है न।

जैसे, मुसीबत में पड़े व्यक्ति को धन-सामग्री देना या मन-शरीर लगाकर मदद करना, दुखी व्यक्ति को हौसला देना, कष्ट में पड़े व्यक्ति के कष्ट को बाँटकर हल्का करना, आत्मा के साथी से गहन प्रेम का आदान-प्रदान करना, वग़ैरह।

इनमें भी दूसरों को दिए जाने वाले प्रेम के रूप में सबसे अच्छा यह है कि उस व्यक्ति की अपनी शक्ति से समृद्धि पैदा कर सकने वाली जीवन-ऊर्जा प्रार्थना के ज़रिए बाँट दी जाए, यही सर्वोत्तम दान बनता है।

बेशक इसके अलावा के दान भी अपनी-अपनी जगह पवित्र हैं, पर प्रार्थना द्वारा दान, उस व्यक्ति के भीतर से शक्ति उमड़ाने वाला, सबसे मूल प्रेम है।

तो ऐसा स्वाभाविक रूप से, बिना प्रयास किए हो सके, इसके लिए पहले अपनी दिव्यता को स्वीकार करो, फिर आसपास के लोगों की दिव्यता, पूरी मानवता की दिव्यता, इस तरह स्वीकार करने का दायरा फैलाते जाना अच्छा है।

इसके लिए सत्य की पुस्तकों को पूरी लगन से बार-बार पढ़ना भी महत्वपूर्ण है, गहरी साँस के ज़रिए आत्मिकीकरण के लिए स्पंदन-समायोजन को गंभीरता से करना भी छोड़ा नहीं जा सकता, और हर समय के विचारों को मानवता के प्रति प्रेम की चेतना से भरकर, निःस्वार्थ अपने को माँजकर ऊँचा उठाना भी ज़रूरी है।

हमेशा कहता हूँ, एक छलाँग में अच्छा अनुभव मिल जाए ऐसा कोई जादू नहीं है, इसलिए धीरज से, थोड़ा-थोड़ा करके, सत्य के वचन-कर्म का अभ्यास करना किसी भी चीज़ से बढ़कर महत्वपूर्ण है।

क्योंकि यही सच्चे असेंशन को आत्मसात करने का सबसे पक्का रास्ता है। (समाप्त)

 

 

 

 

 

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

Angelusbell

वीडियो जल्द आ रहे हैं

वीडियो एक-एक करके जारी किए जाएँगे।

YouTube चैनल पर जाएँ