जीवन का उद्देश्य
प्रकाशित अद्यतन
जब सूर्य का प्रकाश पड़ता है, तो मनुष्य अपनी छाया सूर्य की उलटी दिशा में देखता है, है न।
वही, तुम लोग अब तक “यही मैं हूँ”, “मैं ऐसा हूँ” पक्का मानकर जिस पर विश्वास करते आए, उस आत्म-बोध का असली रूप है।
अच्छी तरह सोचकर देखो।
छाया तुम कैसे हो सकती है?
फिर भी असली रूप को ग़लत समझते आए।
उसी में सच्चे स्व के साथ न जी पाने का असली कारण था।
मूल रूप से बहुत लंबे समय तक तुम लोगों ने सच्चे अपने आप को जानने की कोशिश तक नहीं की।
असमर्थता को स्वाभाविक मान लिया था।
गंभीर बीमारी बताई गई, तो मान बैठे कि अब कोई आशा नहीं।
सोचते थे कि बुरे मानवीय संबंध सुधर ही नहीं सकते।
हार मानने की गुफा से निकलने की कोशिश नहीं की।
बंद पलकों के पीछे के अँधेरे को असली संसार समझने की भूल करते आए।
बंद कानों में सुनाई देने वाले भ्रम को असली आवाज़ समझते रहे।
महत्वपूर्ण बात कहता हूँ।
पहचानो कि तुम सच में क्या हो।
और बस वही बनकर जियो।
यही बार-बार दोहराए गए जीवन का उद्देश्य है।
पुनर्जन्म का लक्ष्य यह है कि हर व्यक्ति असली अपने आप को खोजे, और उसे अपने विचारों, शब्दों और कर्मों में प्रकट करे।
दूसरों से श्रेष्ठ शक्ति पाने की चाह रखने की ज़रूरत नहीं।
न दिखने वाला संसार दिख भी जाए, किसी को न सुनाई देने वाली आवाज़ सुनाई भी दे, तो उससे व्यक्तित्व पूरा नहीं हो जाता।
जीवन के सत्य को अपने हाथ में पकड़कर देखो।
जीवन का वास्तविक रूप याद कर लो, बस।
सार्वभौमिक सत्य के सामने सीधे खड़े होने वाली मन की ऐसी खोज की मुद्रा ही, सच्चे तुम्हें याद करने की प्रेरक शक्ति है।

शेल्फ़ के नीचे बैठकर मिठाई गिरने का इंतज़ार करो, तो कितना भी इंतज़ार करो, वह हाथ नहीं आती, यह स्पष्ट है, है न।
“मैं ऐसा नहीं हो सकता, मुझमें इससे अधिक है” सोचने लगने के बाद से तुम लोग ठीक ऐसा ही कर रहे थे।
ज्ञान से कितना भी तर्क का कवच पहन लो, मनुष्य उससे खुश नहीं हो सकता।
कितनी भी विधियाँ जमा कर लो, बस उससे संतुष्ट हो जाओ, तो कुछ नहीं बदलता।
अगर सच में खुद को बदलना चाहते हो, तो सार्वभौमिक सत्य का एक ही आचरण क्यों न हो, उसे हार माने बिना करते रहो।
आज का युग ऐसा है कि केवल सार्वभौमिक सत्य को आचरण में प्रकट करना ही मनुष्यों को सच्ची खुशी तक ले जाने वाला एकमात्र मार्ग है।
सच्चे तुम लोग, ब्रह्मांड में भरा स्वयं जीवन-स्पंदन हो।
सब कुछ उत्पन्न करने वाली, और चयापचय कराते हुए पालने वाली स्वयं शक्ति हो।
पृथ्वी के लोग ऐसी शक्ति वाले अस्तित्व को ईश्वर या बुद्ध कहते हैं, लेकिन सच में वही तुम लोगों का असली रूप है।
उसे याद करके अपने जीवन-ढंग में दिखाना ही, तुम लोगों को करना है।
उसके सिवा सब कुछ, मनोरंजन जैसी बात है।
सच्चे तुम पर कोई भी चीज़ आघात नहीं कर सकती।
सच्चे तुम जो चाहो वह सब कर सकते हो।
सच्चे तुममें हर कठिनाई पार करने की शक्ति है।
सच्चे तुम किसी भी अस्तित्व के प्रति कृतज्ञता बरसा सकते हो।
सच्चे तुम सब कुछ को घेरकर, सबसे प्रेम कर सकते हो।
क्योंकि स्वयं ब्रह्मांड ही तुम्हारे जीवन का असली रूप है।







