प्रेम की चेतना को फैलाने वाला कृतज्ञता का मन
प्रकाशित अद्यतन
सबसे महत्वपूर्ण बात है, अपने मन-शरीर से प्रेम का लगातार उमड़ते रहना।
उसके लिए, हमेशा अपने मन और वचन-कर्म पर पीछे मुड़कर, “क्या मैं अभी प्रेम वाले मन से जी रहा हूँ?” यह जाँचते रहो।
इस तरह, अपने मन के स्वयं प्रेम होने के लिए, “पाँच इंद्रियों से पहचानी गई चीज़ और मैं एक हैं” ऐसा सोचने का अभ्यास करके, उसे स्वाभाविक पहचान बना लो।
और उससे भी मूल रूप से महत्वपूर्ण बात यह है कि इस तरह “एकता की पहचान” को सामान्य मन बनाने के लिए, एकनिष्ठ कृतज्ञता वाली चेतना में रहो।
किसी भी बात के प्रति, किसी भी व्यक्ति, जीव या प्रकृति के प्रति, “कितनी कृपा है” वाला रिसता हुआ कृतज्ञता का भाव हमेशा झरने की तरह उमड़ता रहे, ऐसे भाव से जियो, तो कहा जा सकता है कि तुम एकनिष्ठ कृतज्ञता वाले मन से जी रहे हो।
कृतज्ञता की चेतना ही एक होने की कुंजी है।
पूर्ण कृतज्ञता वाला जीने का ढंग ही एकत्व की चेतना में लौटने का रहस्य है।
कृतज्ञता प्रेम को गहरा करती है।
कृतज्ञता प्रेम को बड़ा करती है।
कृतज्ञता प्रेम को और चमकाती है।
ऐसे बिताते जाओ, तो तुम कोई न डिगा सके ऐसे प्रेम वाले व्यक्ति बन सकोगे।

एकनिष्ठ कृतज्ञता वाले जीने के ढंग की शानदार बातें और भी हैं।
केवल “धन्यवाद” सोचते हुए जीना, अपनी चेतना के दायरे को फैलाता है।
आसानी से समझाऊँ, तो इसे ऐसा सोच लो कि तुम्हारा शरीर बड़ा, और बड़ा फैलता जा रहा है।
अपने घर जितना बड़ा होता है, अपने मोहल्ले जितना बड़ा होता है, अपने प्रांत जितना बड़ा होता है, अपने देश को समेटने जितना बड़ा होता है, एशिया को भीतर देखने वाली चेतना बनता है, और आगे चलकर पृथ्वी को अपना ही आप महसूस करने वाली चेतना बनता है।
इस तरह चेतना के स्पंदन-क्षेत्र को फैलाते जाओ, तो आगे चलकर “पृथ्वी को हथेली पर देखने जैसी विशाल चेतना” तक पहुँच जाओगे।
तुरंत ऐसा न भी हो, किसी न किसी दिन ज़रूर ऐसी चेतना तक पहुँचोगे।
और न भूलने योग्य महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसी बहुत-बहुत बड़ी चेतना बनना, अब पहली बार ऐसा बनना नहीं है।
क्योंकि मानवता नाम के जीव को चलाने वाले “जीवन के असली रूप” को मूल तक जाकर खोजो, तो वह “स्वयं महान ब्रह्मांड तक लौट पहुँचने वाली चीज़” है।
ऐसे जीवन के सत्य को अपनी चेतना में गहराई तक उतारकर उसका किण्वन होने दो, तो आगे चलकर वह प्रकाश बिखेरकर अपनी चेतना में प्रकट होने का समय आता है। (जापानी में “किण्वन” और “प्रकाश बिखेरना” दोनों “हक्को” बोले जाते हैं।)
इसी तरह, जाने हुए ज्ञान को जीवन के प्रकाश से पचा लो, तो किसी दिन वह ऊपर उठकर, अपने चेतना-विकास के रूप में लौट आता है। (जापानी में “पचाना” और “ऊपर उठना” दोनों “शोका” बोले जाते हैं।)
ठीक है, जिसे तुम अपना “मैं” मानते थे, उसे “यह सच्चा मैं नहीं था” मानकर, मन पक्का करके छोड़ दो (और साफ़-साफ़ देख लो; जापानी में “आकिरामेरु” के दोनों अर्थ हैं)।
“उस छोटे-से शरीर” को ही अपना स्व मानकर, पक्का करके रखे लंबे सपने से जागने की सही घड़ी आ गई है।
अभी पृथ्वी-जगत के सवेरे की घड़ी है।
आज की पृथ्वी की मानवता अब ऐसे समय में जी रही है, जब उसे “लंबे भ्रम के सपने” से जागकर, उठना ही होगा।
“न उठे तो क्या होगा” पूछते हो? चिंता करने की ज़रूरत नहीं।
ऐसा न हो, इसीलिए तो तुम लोगों को पृथ्वी पर भेजा गया है, इसलिए ऐसा होने का सवाल ही नहीं, है न।
तुम लोग, पृथ्वी के समाज को एक चरण ऊपर के मंच तक ले जाने के लिए, अभी इस ग्रह पर हो।
पृथ्वी पर आने का उद्देश्य याद करके, इसी क्षण को पूरी गंभीरता से, जीवन को पूरा काम में लगाकर पूरी तरह जिएँ।
क्योंकि बस ऐसा करते रहो, तो वह समय आएगा जब “धरती-आकाश हिला देने वाली घटना” पृथ्वी-जगत को बहुत बदल देगी।







