तारों की बिरादरी में शामिल होने के लिए
प्रकाशित अद्यतन
अंतहीन-सा लगने वाले महान ब्रह्मांड में
आख़िर कितनी आकाशगंगाएँ हैं?
और कितने तारे हैं?
बहुत पहले एक अंतरिक्ष के भाई से पूछा था
उसका उत्तर कुछ ऐसा था
अभी जानने की ज़रूरत नहीं
तुम लोगों को यह जानने की ज़रूरत भी नहीं
क्योंकि पृथ्वी के लोग अभी
अपने पैरों पर चलने में भी डगमगाते हैं
और जीवन के सार को भी भूल चुके चरण में हैं
इससे बेहतर करने योग्य है
यह जानना कि तुम कौन हो
मन की मैल साफ़ करते हुए
समग्र सामंजस्य की कामना और प्रार्थना करना
और उस चेतना को अपने कर्म के सिद्धांत तक ऊपर उठाकर
उसे अपना बना लेना
ऐसे जीते रहो तो
समय आने पर
तुम्हारा प्रश्न भी सुलझ जाएगा
“पृथ्वी अभी कितने साल की होगी?”
क्या तुमने विशाल महान ब्रह्मांड में
पृथ्वी की उम्र के बारे में कभी सोचा है?
वह तो……
पृथ्वी के मनुष्य की उम्र में बदलें तो
वयस्क होने के ठीक पहले के समय में है
पृथ्वी सौरमंडल में सबसे युवा है
सबसे छोटी संतान कहा जा सकने वाला तारा है
इसलिए हम अब तक हमेशा
तुम लोगों को पता न चले ऐसे
पीछे से सहारा देते हुए
लगातार पृथ्वी के विकास पर नज़र रखते आए हैं
तुम लोगों के समय में
चार अरब साल का इतिहास रखने वाला यह ग्रह
अतीत में छह बार विनाश और फिर से शुरुआत का अनुभव कर चुका है
और अभी सातवें कल्प में है
ग्रह-विकास की प्रक्रिया में सातवीं बार का अर्थ है
पूर्णता की सही घड़ी
तुम पृथ्वी पर किस उद्देश्य से आए थे, याद करके देखो
तुम पृथ्वी की मानवता मूल रूप से
सब कुछ संभव करने वाले ब्रह्मांडीय दिव्य-आत्मा थे
लेकिन तुम पृथ्वी पर स्थानांतरित होने के बाद से
एक बार ऐसे जीवन के सत्य को भूलकर
कीचड़ भरे अँधेरे में प्रयोग और भूल करते आए न
यह रास्ता भटकना नहीं था
यही मनुष्य के सत्य की ओर वापसी
और ग्रह-विकास के लिए ज़रूरी रास्ता था
अपने सत्य के ब्रह्मांड होने को याद करके
पृथ्वी को पूर्ण सामंजस्य वाले तारे तक ले जाने के लिए
बार-बार पुनर्जन्म लेते हुए
पवित्रता को निखारकर
इस बार आख़िरकार अंतिम पूर्णता के समय
पूरी तैयारी के साथ जन्म लिया
वही तुम लोग हो

इसी क्षण भी
नए जन्म लेने वाले तारे भी हैं
और भूमिका पूरी करके मरते तारे भी हैं
ऐसे ब्रह्मांड-संचालन की महान व्यवस्था से देखें तो अभी
पृथ्वी वयस्क होने के ठीक पहले की उम्र में है
और जल्द ही ब्रह्मांडीय समाज में
शामिल होने वाले समय में है
अभी इस समय
“जीवन क्या है?
मैं कौन हूँ?
मैं क्यों जन्मा?
मुझे कैसे जीना चाहिए?”
यह अपने जीवन की गहराई से पूछकर देखो
और कौंध से उसका उत्तर पकड़ लो तो
तुम्हारा जीवन बहुत बदल जाएगा
“मैं” नाम की छोटी चेतना को महान ब्रह्मांड में घोलकर
ब्रह्मांडीय चेतना से स्वयं और पृथ्वी को फिर से निहारकर
महान सामंजस्य वाली पृथ्वी रचने का समय आ गया है
इसीलिए अभी
नस्ल, जाति, सीमाएँ, विचार और मत, त्वचा का रंग, अमीरी-ग़रीबी……
ऐसे अंतरों से परे होकर
पूरी मानवता के साथ हाथ मिलाओ
इसके लिए अपने
मानसिक स्पंदन में सामंजस्य लाने वाली जीवन-शैली जियो
यही सबसे महत्वपूर्ण बात है
मन सँवर जाए तो उसकी गूँज भौतिक शरीर को भी आत्मिक बनाती है
मन और शरीर दोनों का आयामी उत्थान हो जाए तो
मन-शरीर में स्वतंत्रता प्रकट करके जीने वाले समय की
अनंत शक्ति को फिर से जगाकर जीना भी संभव हो जाता है
उस चेतना को मज़बूती से धारण करने का क्षण ही है
ब्रह्मांडीय समाज के सदस्य होने का बोध याद आने का क्षण
तुम अभी पृथ्वी के विकास के लिए
हमारे साथ काम कर रहे हो न
और तुम पहले ही पीड़ा की अवस्था में नहीं हो
क्योंकि पवित्र मानवता होने का बोध
पहले ही याद कर चुके हो
और अंत में बस एक बात बता देता हूँ
तुम लोग जिसकी प्रतीक्षा करते आए हो
भौतिक देह के रूप में फिर से मिलने का वह समय
सचमुच अब बिल्कुल पास आ चुका है
बस इतना बता देता हूँ
ब्रह्मांड की बहुत सी आँखें हमेशा तुम लोगों पर नज़र रखती हैं






