“सबसे पहले ज़रूरी चीज़” का आयामी उत्थान ~ धन से पुण्य की ओर
प्रकाशित अद्यतन

आज तुम लोगों के दिमाग़ में, “सबसे पहले आने वाली चीज़” (जापानी में “साकिदात्सु मोनो”, यानी वह चीज़ जो हर चीज़ से पहले चाहिए) सुनते ही लगता है, “और कुछ हो न हो, पैसा तो चाहिए ही”, है न।
लेकिन भविष्य की पृथ्वी पर, पैसा किसी काम का नहीं रहेगा, वह समय आएगा।
उस समय तुम लोग परेशानी में पड़ो, यह दुखद होगा, इसलिए अभी से कम से कम चेतना में ही, “सबसे पहले ज़रूरी चीज़” का असेंशन करा लेते हैं।
तो, अब मन की स्ट्रेचिंग।
भविष्य के संसार में चलने वाली सबसे पहले ज़रूरी चीज़ क्या है?
सीधे-सीधे, यह चीज़, ऐसा कुछ सोचकर देखो।
सोना (गोल्ड)?
चावल या गेहूँ का आटा?
ज़मीन?
प्रेम?
मन की समृद्धि?
हम्म, इनमें से कोई नहीं।
उत्तर है “पुण्य”।
भविष्य की पृथ्वी पर, पैसे की जगह पुण्य सबसे पहले ज़रूरी चीज़ बन जाएगा, वह समय आएगा।
तो, “आख़िर पुण्य है क्या?” यहीं से खोलना शुरू करते हैं।
पहले शब्दकोश देखो।
“आत्मसात किया गया चरित्र”, “सामाजिक रूप से मूल्यवान गुण”, “शुभ और न्याय का अनुसरण करने वाली व्यक्तित्व की क्षमता”, “दूसरों पर व्यापक प्रभाव डालने वाला वांछनीय आचरण” आदि, “पुण्य” नाम के गुण के तरह-तरह के अर्थ समझाए गए हैं, है न।
मोटे तौर पर यह समझ ग़लत नहीं, लेकिन अगर कहूँ, “दिव्यता पर आधारित विचार, वचन और कर्म से मन में जमा होती उस व्यक्ति की मन की बचत”, तो शायद आसानी से समझ आए।
आज के लोग शेयर ख़रीदकर, अचल संपत्ति ख़रीदकर, बचत करके, क़ीमती धातुएँ ख़रीदकर, अपनी कमाई की कुल मात्रा बढ़ाने की कोशिश करते हैं, लेकिन पवित्र सभ्यता के युग में बदलने पर, इन सबका कोई अर्थ नहीं रहेगा, यह याद रखना अच्छा है।
नए युग में मानसिक और भौतिक दोनों रूपों में समृद्धि से जी सकने वाले लोग, बिना एक भी अपवाद के, अब तक जमा किए पुण्य की मात्रा और गुण के अनुसार ही उसके योग्य जीवन जीएँगे, ऐसा हो जाएगा।
पुण्य का जोड़ सीधे जीवन की समृद्धि में प्रतिबिंबित होने लगेगा। लेकिन पुण्य आज से भी जोड़ा जा सकता है, इसलिए चिंता मत करो।
जो समृद्धि की कामना बिल्कुल नहीं करते, उनमें भी जो पुण्य से समृद्ध हैं, उनका मन और जीवन दोनों समृद्ध हो जाएँगे।

“स्वर्ग का जाल विशाल है, उसके छेद बड़े हैं, फिर भी उससे कुछ नहीं छूटता”, यह कहावत सुनी है न।
स्वर्ग, ईश्वर, जीवन का मूल स्रोत, सब मनुष्यों के हर पल के विचार, वचन और कर्म को ज़रा भी छोड़े बिना पूरा जानता है।
वह सब मन के भीतर पूरा दर्ज है।
और उसमें धोखा नहीं चलता।
“कोई देख तो नहीं रहा, थोड़ा बेईमानी करके ज़्यादा बता दूँ तो क्या हर्ज”, ऐसा सोचकर अपने पुण्य की मात्रा में धोखा देना चाहो भी, तो हर व्यक्ति की दिव्यता ऐसा करने नहीं देती।
और उस समय तक, एक-दूसरे के विचारों की अवस्था आर-पार दिखने लगेगी, और किसी भी तरह का धोखा न चलने वाला संसार बन चुका होगा।
समझ गए न।
आगे का संसार ऐसा बनेगा जिसमें किसी भी तरह की बेवफ़ाई या अनैतिकता नहीं चलेगी।
जिन्हें ऐसी भावना छोड़ने में समय लगेगा, वे शायद किसी और जगह फिर से सीखेंगे।
लेकिन अगर तुम अपने आसपास ऐसे किसी को देखो भी, तो ज़रूरत से ज़्यादा चिंता करने की ज़रूरत नहीं।
जैसा हमेशा कहता हूँ, विकास की अवस्था में लोगों के बीच पृथ्वी के समय से 20 करोड़ या 30 करोड़ वर्ष का अंतर भी हो, तो जीवन के मूल संसार से देखने पर वह ऐसा दिखता है मानो कोई अंतर ही न हो।
तुम दूसरों के भविष्य की चिंता छोड़कर, अपना दायित्व याद करो।
तुम किसलिए पृथ्वी पर आए?
किसलिए अभी, इस युग में जन्मे?
और उसके साथ ही, हमेशा खुद से पूछते रहो कि तुम क्या हो।
क्योंकि जो अपने जीवन का वास्तविक रूप नहीं जानता, उसका मन जड़हीन घास जैसा हो जाता है, और वह पुण्य जोड़ना चाहे भी तो जोड़ नहीं पाता।






