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तारों के साथ संवाद के युग का द्वार खोलने के लिए

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

Voice of Space Brothers

जल-विभाजक के युग में (उत्तरार्ध)

प्रकाशित अद्यतन

(पिछली बार से जारी)

★सच कहें तो

तो सच कहें तो, मनुष्य है इसीलिए, भटकना संभव ही नहीं।

मनुष्य है इसीलिए, छल-कपट की कोई ज़रूरत नहीं।

मनुष्य है इसीलिए, चुपचाप सहकर सो जाने की कोई ज़रूरत नहीं।

मनुष्य है इसीलिए, कष्ट सहने की ज़रूरत नहीं।

मनुष्य है इसीलिए, ग़ुस्सा आता ही नहीं।

मनुष्य है इसीलिए, दूसरों से ईर्ष्या या डाह करने का ज़रा भी कारण नहीं।

मनुष्य है इसीलिए, दूसरों को हानि पहुँचाने जैसे विचार, वचन और कर्म कर पाना संभव ही नहीं।

सच्चा मनुष्य, छिपाने को कुछ भी नहीं है इसलिए, निडर और खुले रूप से जी सकता है।

सच्चे मनुष्य (जिसने जीवन का प्रकाश प्रकट कर लिया है) में एक क्षण में सब कुछ समझ लेने की शक्ति है।

सच्चा मनुष्य भावनात्मक विचारों से डगमगाकर दिव्यता खो देने जैसा कुछ नहीं करता।

इस तरह, “सच्चा मनुष्य ○○○○○○○……” कहकर, अपने पर लागू होने वाले शब्द खोजो और काग़ज़ पर लिखकर देखो।

स्मार्टफ़ोन के नोट में लिखकर दर्ज करना भी चलेगा।

कोई भी शब्द चलेंगे।

वैसे भी यह किसी को दिखाने की चीज़ नहीं है, इसलिए चाहे कितनी भी शर्म की बात लगे, हर हाल में लिखकर देखना, अपने शब्दों के रूप में सचमुच बाहर निकालकर देखना महत्वपूर्ण है।

तब समझ आता है कि अभी जीवन के जल-विभाजक पर खड़े होकर आगे किस दिशा में बढ़ना है, यह स्पष्ट हो जाता है, और बिना भटके अपनी चुनी हुई ढलान पर बहते जाना संभव हो जाता है, यही बात है।

यह चेतना के दृष्टि-क्षेत्र की धुंध छाँटने का तरीक़ा भी है।

तुम लोग बस एक क़दम की दूरी तक आ चुके थे, फिर भी कभी-कभी, या कहें अक्सर, इधर डगमग, उधर डगमग करते हुए रास्ते में भटकते थे, इसका कारण यह था कि चेतना के दृष्टि-क्षेत्र में धुंध छाई हुई थी और दृष्टि अस्पष्ट थी, है न।

इसलिए मनुष्य के सत्य की स्पष्ट समझ, विवेकपूर्ण पहचान नहीं हो पा रही थी; तो अभी की तरह, अब तक का अपना और आगे “ऐसा बनना है, ऐसा होना है” सोचने वाला अपना, दोनों को लिखकर, भविष्योन्मुख होकर उसे भीतर उतार लेने से, बाक़ी जल-विभाजक से बह निकले जीवन के पानी की धारा पर सवार होकर चीज़ें सहज रूप से चलती जाती हैं।

झूठ लगे या न लगे, कुछ भी हो, करके देखो।

बस गंभीरता से, मन की गहराई के सत्य (जीवन) के सामने सीधे खड़े होकर।

चेतना के विकास की ओर बढ़ने वालों के लिए आज से ज़्यादा जीने में आसान युग कोई नहीं।

क्योंकि आत्मिकीकरण आगे बढ़ने से चेतना द्वारा वास्तविकता का सृजन पहले से कहीं ज़्यादा आसान हो गया है।

ठीक है।

तुम कर सकते हो।

चेतना के हवाई झूले से छलाँग लगाकर पूर्ण दिव्यता की दुनिया में जाने की सही घड़ी अभी इसी समय, आज इसी क्षण के सिवा और कोई नहीं, ऐसा मन पक्का कर लो, तो न हो सकने वाला कुछ भी नहीं। (समाप्त)

 

 

 

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

Angelusbell

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वीडियो एक-एक करके जारी किए जाएँगे।

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