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तारों के साथ संवाद के युग का द्वार खोलने के लिए

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

Voice of Space Brothers

अपराध को धरती से मिटाते जाने के लिए (पूर्वार्ध)

प्रकाशित अद्यतन

★हत्या और हिंसा तब कर्म में उतरती है जब मन अँधेरे में घुल-मिल गया हो

तुम्हारी चेतना के परदे से होकर देखी जाने वाली पृथ्वी की ख़बरों में, मन के रोग (अँधेरे) से ग्रस्त होने के कारण, जिनमें जीवन की चमक बिल्कुल प्रकट नहीं हो रही, ऐसे मामलों के कर्म तरह-तरह की घटनाओं के रूप में बताए जा रहे हैं। (जापानी में “अँधेरा” और “रोग” दोनों “यामी” बोले जाते हैं।)

जैसे, बस इसलिए कि चीज़ें अपने मन-मुताबिक़ नहीं हो रहीं, दूसरों को चोट पहुँचाने की इच्छा हो, या कौतूहल भर से किसी को मार डालने का विचार मन में कौंध जाए, तो इतने से ही मन तक प्रकाश पहुँचना बंद हो चुका है और वह बहुत कष्ट की स्थिति में है, यही उसका मतलब है।

और अगर वह विचार मुँह से निकल भी जाए, तो यह कहा जा सकता है कि जीवन की चमक लगभग दिखनी ही बंद हो गई है, बहुत ख़तरनाक स्थिति है।

और अगर उसे कर्म में उतारकर सचमुच किसी की जान ले ली जाए, तो उसके बाद का जीवन बहुत भारी बोझ ढोते हुए जीना पड़ता है।

क्योंकि सारा जीवन प्रायश्चित में बिताने जैसा, कितना नुक़सान कम किया जा सके इसी में सारा समय चला जाता है।

यह लंबे समय में थोड़ा-थोड़ा चुकाते जाने वाला, जीवन का बड़ा उधार लादकर जीना है।

जीवन के नियम के दृष्टिकोण से देखें, तो यह ऐसा भी है कि जीवन का बीज ज़मीन के नीचे दबा ही रह जाता है, धूप पाने का अवसर उससे छिन जाता है, और जीते-जी पूरे समय जीवन को न जी पाने की स्थिति चलती रहती है।

और ऐसा करवाने वाला कोई और नहीं, अपराधी स्वयं ही है।

ऐसी हत्या-हिंसा तब कर्म में उतरती है, जब जीवन का प्रकाश भूल चुका मन अँधेरे में पूरी तरह घुल-मिल गया हो।

★आज के मानसिक स्तर पर मृत्युदंड की व्यवस्था का होना बेहतर है

हमारी नज़र में, कुछ मामलों में परलोक में जाकर जीवन को फिर से धो लेना जल्दी सँभलने का रास्ता होता है, पर आज की पृथ्वी पर मानवीय दृष्टिकोण से, जीकर प्रायश्चित करने और सुधरने के रास्ते को महत्व दिया जाता है, और हत्या करने वाले की आत्मा का बोझ अक्सर आसानी से हल्का नहीं हो पाता।

इसलिए अगर दुनिया के देश मृत्युदंड पर रोक लगाए हुए आगे बढ़ते जाएँ, तो जेलों का भार बढ़ेगा, और शायद उसे पूरे समाज को सहारा देना पड़ेगा।

तब फिर दूसरी समस्याएँ पैदा होंगी, पर वह आज की बात के विषय से बाहर है, इसलिए फिर कभी।

हमें जो दिख रहा है उसमें से एक बात बताएँ, तो जब तक मानवता की चेतना आज के मानसिक स्तर पर है, तब तक मृत्युदंड की व्यवस्था में आत्मा के उद्धार से जुड़ा पहलू भी है, यही है।

लेकिन कौन-सा चुनाव करना है, यह तो तुम्हारी चेतना तय करती है, इसलिए हमारे मुँह से ज़ोर-ज़बरदस्ती जैसी कोई एक बात भी नहीं कही जा सकती। (अगली बार जारी)

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

Angelusbell

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वीडियो एक-एक करके जारी किए जाएँगे।

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