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तारों के साथ संवाद के युग का द्वार खोलने के लिए

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

Voice of Space Brothers

बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित न होने वाली चेतना को मानक रूप से अपनाओ-1

प्रकाशित अद्यतन

असेंशन कर चुके लोगों द्वारा आत्मसात किया गया भविष्य का सामान्य ज्ञान

जिसने सच्चा असेंशन अनुभव किया है, उसमें एक क्षमता पहले से ही है।

वह है “बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित न होना”, यानी “जीवन में मूल रूप से मौजूद बोध-शक्ति”।

इसी कारण वे कुछ भी हो जाए घबराते नहीं, शांति से स्थिति को एक पल में समझ लेते हैं, और पवित्रता पर आधारित विचार, वचन और कर्म को तन-मन में प्रकट करते हैं।

इसलिए वे कुछ भी देखें या सुनें……, हम्म, चाहे खुद कैसी भी स्थिति में हों, उनमें यह बोध नहीं होता कि बाहरी परिस्थितियों से वे इधर-उधर उछाले जा रहे हैं।

वे अपने आसपास के मानवीय संबंधों या अपनी जगह में, कुछ हो या न हो, किसी चीज़ पर दोष नहीं डालते, और बाहर महसूस होने वाली बात का कारण हमेशा भीतर देखने वाली स्वाभाविक मान्यता के ज़रिए, अपने संसार को और अधिक एकीकृत और सामंजस्य में लाते जा रहे हैं।

“पृथ्वी का भाग्य अच्छी दिशा में बना हुआ है, तो इसमें ऐसे अग्रदूतों की ‘सही बोध-शक्ति’ एक बड़ा सहारा है”, यह बात भी यहाँ बता दूँ। आगे चलकर यह तथ्य ज़रूर खोला जाएगा।

वे, कोई कुछ कहे या करे, उससे पैदा हुए परिणाम की ज़िम्मेदारी दूसरों पर नहीं थोपते।

बड़े भूकंप, अचानक बाढ़ या तूफ़ान जैसी आपदाओं से नुक़सान झेलकर भी, कष्ट और दुख लिए होते हुए भी, उजला, आगे बढ़ने वाला मन खोए बिना, एक-एक कदम जीवन को फिर से सँवारने में लगे रहते हैं।

अब तक के सामान्य ज्ञान वाली मनुष्य-दृष्टि रखने वालों को यह बिल्कुल अस्वीकार्य, बेवकूफ़ी भरा जीवन-ढंग लग सकता है, लेकिन आगे चलकर यह पृथ्वी के सब लोगों का सामान्य जीवन-ढंग बनता जाएगा।

और हम देखते हैं कि जिन इलाकों में वह “सही बोध-शक्ति” चरम तक पहुँचा चुके लोग रहते हैं, वहाँ नुक़सान अपेक्षा से कम रहा, ऐसा भी होता है। बेशक, यह बात नुक़सान झेलने वालों को दोष देने के लिए नहीं। आपदा किसी का न्याय करने के लिए होने वाली घटना नहीं है।

“साल के आख़िरी दिन से पहले के युग” में चल रही बड़ी सफ़ाई की वर्तमान स्थिति

जब पृथ्वी की सभ्यता जड़ से नया जन्म लेने जा रही है, ऐसे युग में कब कहाँ क्या हो जाए, आश्चर्य नहीं, यह तो समझ आता है न।

मौसम में बदलाव हर साल जैसे उद्घोषकों और समाचार-वाचकों से “अभूतपूर्व फलाँ”, “कभी न हुआ फलाँ” जैसे “भारी-भरकम विशेषण लगे शब्द” कहलवा रहे हैं।

भू-पर्पटी की प्लेटों के बदलाव में ऐसी स्थिति छिपी है कि कब कहाँ बड़ा भूकंप आ जाए, कोई आश्चर्य नहीं।

और सबसे बढ़कर, अवचेतन की परतों में जमा होकर लंबे समय तक सतह पर न आए “पृथ्वी की मानवता के कर्म-कारण”, उन्हें चुकाने के लिए “सबसे उपयुक्त समय, स्थान और लोगों का संयोग” पाकर कर्म-फल (कर्म-अग्नि; जापानी में दोनों “गोका” बोले जाते हैं) बनते हैं, और लोगों के मन को मनुष्य के लिए बिल्कुल अशोभनीय कर्मों की ओर धकेल रहे हैं।

इसीलिए लगभग रोज़ कहीं न कहीं कोई दर्दनाक घटना कर बैठता है, है न।

“इतना अच्छा आदमी, उसने ऐसा क्यों…” कहकर चौंकना भी होता है, है न।

और हर बार वहाँ ऐसे लोग होते हैं जो उसकी चपेट में आ जाते हैं।

यह केवल व्यक्तियों के बीच तक सीमित नहीं।

देश के नेताओं के नेतृत्व में “नरसंहार” या “सत्ता का दुरुपयोग” तो इसका चरम रूप है।

व्यक्तियों के बीच बुरा संयोग हो, तो उससे बचा जा सकता है, लेकिन जो लोग ऐसी स्थिति में जी रहे हैं जहाँ देश ही अपने नागरिकों की उपेक्षा करता है, उनके पास भागने की कोई जगह नहीं।

जापान जैसे “अपेक्षाकृत शांत देशों” में जीने वालों को यह बात शायद वास्तविक न लगे, लेकिन ऐसी स्थिति में इसी पल भी, साँसें टूटते-टूटते किसी तरह जी रहे लोग इसी पृथ्वी पर करोड़ों हैं, यह असेंशन (आयामी उत्थान) की ओर उन्मुख तुम लोगों को नहीं भूलना चाहिए।

(अगली बार जारी)

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

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वीडियो जल्द आ रहे हैं

वीडियो एक-एक करके जारी किए जाएँगे।

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