बच्चों के साथ बढ़ने के लिए (उत्तरार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
इसी नाम का पिछला लेख
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(पिछली बार से जारी)
★जीवन के बारे में सोचें
मूल रूप से जीवन पैसे देकर खरीदी गई चीज़ नहीं है।
जिस शरीर नाम के भौतिक पिंड में तुम्हारी चेतना सवार है, वह भी न उस व्यक्ति की संपत्ति है, न अपनी शक्ति से बनाई चीज़।
जीवन ब्रह्मांड से बाँटकर दिया गया है न?
और शरीर पृथ्वी के जीवन-तत्वों के आधार पर, माँ और पिता, विशेषकर माँ के अपना शरीर घिसने वाले प्रयास से आज यहाँ आकार वाले रूप में है न?
और कहें तो, सोचकर देखो कि तुम क्यों जीवित रह पा रहे हो।
प्रकाश-संश्लेषण करने वाले पौधे हैं इसलिए वायु है और साँस ली जा सकती है न?
जल है इसलिए सूखे बिना रह पा रहे हो न?
भोजन है इसलिए भूख से मरे बिना रह पा रहे हो न?
धरती है इसलिए ज़मीन में दबे बिना, पानी में डूबे बिना जी पा रहे हो न?
मूल रूप से सोचो तो, आखिर पृथ्वी है इसीलिए अस्तित्व में रह पा रहे हो न?
इस तरह देखते जाओ, तो कहा जा सकता है कि तुम पृथ्वी की समस्त मानवता हर चीज़ द्वारा जीवित रखे जाकर अभी वहाँ अपना रूप बनाए रख पा रहे हो।
ऐसी स्वाभाविक बात का एहसास न कर पाना इसलिए है कि कल्पना-शक्ति अभी सोई हुई है।

★कल्पना-शक्ति पुनर्जीवित करके तारे जैसी जीवन-शैली जिएँ
पहले भी कहा था, कल्पना-शक्ति नियति बनाने वाली मूल शक्ति है।
कल्पना-शक्ति, यानी वही सृजन की शक्ति है।
जिनकी चेतना स्वार्थपरकता के कर्म-कोकून में घुस चुकी है, उनमें जीवन-शक्ति की आपूर्ति रुकने की प्रवृत्ति होती है, इसलिए इतनी महत्वपूर्ण कल्पना-शक्ति दुर्लभ हो जाती है।
पिछले जन्मों के शुभ बंधन से समृद्ध कल्पना-शक्ति वाले तुम, ताकि अभी दिव्यता भूले हुए लोग एक दिन भी जल्दी जीवन के सार को याद कर सकें, खुद को चमकाते हुए जियो।
यह वही बात है जो मैं हमेशा कहता हूँ, “ग्रह जैसी नहीं, बल्कि तारे जैसी जीवन-शैली जी सकने वाले व्यक्ति बनो।”
जिस पृथ्वी-संसार में अभी तुम्हारी सतही चेतना है, वह ब्रह्मांड से देखें तो घोर अंधकार का संसार है।
और अंधकार में सबको आसपास दिख सके, इसके लिए प्रकाश चाहिए न?
इसीलिए कहता हूँ कि जीवन से चमकने वाले लोग चाहिए।
ऐसा कर सकने वालों की कुल संख्या अभी बहुत कम है।
इसलिए तुमसे क्षमा चाहते हुए, तुम्हारे मन और शरीर का पूरा उपयोग कर रहे हैं।
तुम्हारे रोज़ अनायास छोड़े जाने वाले शुभ विचारों को संबंध-सूत्र बनाकर, हमारे जीवन के प्रकाश को साथ चढ़ाकर पृथ्वी-संसार में विकिरित कर रहे हैं।
और उसके पीछे, तुम्हारे संरक्षक देवता की अनुमति से, तुम्हारे अर्ध-आत्मिकीकृत शरीर-स्पंदन की गहराई में स्थित, शरीर को बनाने वाले मूल तत्व (हाकु-तत्व) लेकर, अभी जीवन के सार से अनजान लोगों में डाल रहे हैं।
यह कर सकने वाले पृथ्वी पर तुम्हारे अलावा कोई नहीं।
तुम्हारा अस्तित्व अनमोल है और पृथ्वी का खज़ाना है, यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि उसी कार्य को व्यक्त करने वाली अभिव्यक्ति है, समझ रहे हो न?
बात को शुरू में लौटाएँ, तो जैसे तुम अनमोल और धरती के खज़ाने हो, वैसे ही पृथ्वी के सभी बच्चे भी अनमोल और खज़ाने हैं।
क्योंकि वे वयस्कों द्वारा धारण किए दुर्भाव को झाड़कर शुद्ध करके, जीवन के सार यानी दिव्यता को बाहर निकाल रहे हैं न?
और वे आगे की पृथ्वी पर दिव्य-आत्मा सभ्यता बनाने वाले लोग हैं, इसलिए उच्च देवता ही भौतिक लोक में जन्म की प्रतीक्षा-कक्ष में इकट्ठे होकर धरती की माताओं के गर्भ में बस रहे हैं।
ऐसे उनके अस्तित्व के ज़रिए वयस्कों के जीवन का सार निखारा जा रहा है।
मनुष्य के वयस्क, इस तरह उन्हें पालने के ज़रिए, खुद देवताओं के प्रेम को याद करने की प्रक्रिया में होते हुए भी, दूसरी ओर उनके द्वारा पाले जा रहे हैं।
इसलिए, सभी उम्र और स्त्री-पुरुष सब साथ मिलकर बढ़ने के भाव से, वयस्क भी मासूमियत से अपने जीवन के स्रोत के जीवन-महासागर में कूद पड़ें, यही अच्छा है।
यहाँ अच्छा मोड़ है, इसलिए इस बार की बात यहीं समाप्त करते हैं। (समाप्त)






