असेंशन को अनुभव करने के लिए (पूर्वार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
★बाहरी कारणों के बदलने से अपने में आने वाला बदलाव एक भ्रम है, यह सत्य
“असेंशन हो जाए तो कौन-से लक्षण दिखेंगे?” ऐसा प्रश्न रखने वाले लोग हैं, ऐसा लगता है, इसलिए आज उससे जुड़ी बात करते हैं।
लेकिन उससे पहले, बात में उतरने से पहले एक ही बात जान लो, असेंशन होना असल में कोई बीमारी लगना नहीं है, इसलिए लक्षण नहीं बल्कि बदलाव……, और वह भी चेतना के गहरे होने के परिणाम के रूप में बदलाव होता है, बस इतनी बात अच्छी तरह पकड़ लेना।
और, यहाँ से आगे की बात, भले ही वह तुम पर ही लागू होती हो, ऐसे पढ़ो मानो किसी और की बात हो, पूरे को तटस्थ होकर देखने वाली दृष्टि से, तो समझना आसान होगा, इसलिए यह ध्यान रखकर पढ़ना।
ठीक है?
तो मुख्य बात पर आते हैं, लक्षण कहो या बदलाव, कोई भी शब्द इस्तेमाल करो, उस प्रश्न को उठाने वाले भाव के पीछे “यह अपेक्षा कि अपने-आप मेरा कुछ बदल जाएगा” पड़ी हुई दिखती है, है न
उस तरह के भाव से एक कदम अलग होकर देखना, सच में असेंशन की ओर एक महत्वपूर्ण कदम बनता है।
क्योंकि असेंशन का अर्थ है “चेतना का जीवन की मूल दिव्यता में लौट जाना”।

यही कारण भी है कि हम शुरू से अंत तक एक ही बात पर टिके रहकर “चेतना के विकास की ओर उन्मुख जीवन-ढंग” की सलाह देते हैं।
इस तरह के प्रश्न उठाने वाले मन को देखो, तो समझ में आता है कि चेतना आसानी से बाहर पर निर्भर रहने वाली विचार-आदतों से मेल खा जाती है।
सच कहूँ तो, ऐसा नहीं है कि मन-शरीर के बाहर का कुछ बदल गया इसलिए तुम भी बदल सकते हो, बल्कि पहले चेतना का गहरा होना आता है, और अनुभव किया जा सकने वाला बदलाव बाद में साथ आता है (भीतर से उमड़ पड़ता है)।
भले ही बाहरी कारण बदल जाएँ, अगर वह व्यक्ति स्वयं अपनी इच्छा से नहीं बदलता, तो उस व्यक्ति में कोई मूलभूत बदलाव नहीं आता।
इस अर्थ में, असेंशन को चेतना की स्थिति को दिव्य क्षेत्र तक ऊपर उठाना भी कहा जा सकता है।
तो, “दिव्य क्षेत्र क्या है?” ऐसा सोचने वालों के प्रश्न का उत्तर दूँ तो, वह वह स्थान है जहाँ जीवन मूल रूप से रहता है, और क्योंकि वह अनंत सत्य, शिव और सुंदर का संसार है, इसलिए वह ऐसा स्पंदन-क्षेत्र है जहाँ कोई भी दूषित भाव (जीवन के सार से अलग हो चुके विचार) एक क्षण भी टिक नहीं सकता।
लेकिन वह स्पंदन-क्षेत्र बाहरी कारणों से नहीं मिलता।
वह तो बिना थके चेतना के विकास की ओर उन्मुख होकर विचार, वचन और कर्म करने के परिणाम में बना भीतरी कारण है।
यानी कहा जा सकता है कि वह “किसी भी बात, किसी भी चीज़ में न बँधने वाली मनःस्थिति द्वारा रचा गया संसार” है। (अगली बार जारी)





