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तारों के साथ संवाद के युग का द्वार खोलने के लिए

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

Voice of Space Brothers

असेंशन का अनुभव करने के लिए (उत्तरार्ध)

प्रकाशित अद्यतन

​ इसी नाम का पिछला लेख

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(पिछली बार से जारी)

★ऐसे व्यक्ति बनो जिसमें निश्छलता और विवेकशील गुणों का सामंजस्य हो

सचमुच चेतना का विकास होता है तो बोध पूरी तरह बदल जाता है।

सरल शब्दों में कहें तो, ऊपरी तौर पर जो बातें दुर्भाग्य लगती थीं, वे दुर्भाग्य लगती ही नहीं।

उदाहरण के लिए, अब तक जिसे नापसंद करते थे उसकी दिव्यता दिखने लगती है तो वह नापसंद नहीं रहता, या असामंजस्य को सामंजस्य में बदलने का उपाय हथेली पर रखी चीज़ की तरह साफ़ समझ आता है तो पीड़ा की तलहटी में डूबना बंद हो जाता है; इसे “ऐसा कुछ नहीं जो मनचाहा न हो” भी कहा जा सकता है।

और वह “मनचाहा” अब तक की तरह अपनी-अपनी सुविधाओं के टकराव के अंत में विजेता वाला “मनचाहा” नहीं, बल्कि दिव्य क्षेत्र वाला “मनचाहा” है, इसलिए किसी का “मनचाहा” दूसरे के “मनचाहे” से रगड़ता या टकराता नहीं।

चेतना दिव्य क्षेत्र में प्रवेश करती है तो सब कुछ महान सामंजस्य के भीतर चलने लगता है।

ऐसा होने के लिए सबसे परम जीवन-ढंग यह है कि हो सके तो सीधे-सादे, निश्छल ढंग से जियो, यही सबसे अच्छा है।

कठिन तर्क समझ न आएँ तब भी, जो बस सहज भाव से “जीना आनंददायक है” सोच सके, वह दिव्य क्षेत्र में रह सकता है, और कहा जा सकता है कि वह स्वाभाविक रूप से असेंशन वाली मनोदशा में है।

फिर भी, इस निश्छल स्वभाव के ज़रिए दिव्य क्षेत्र में प्रवेश करने वालों को भी आख़िरकार, कभी न कभी कहीं न कहीं, उस निश्छल स्वभाव का आयामी उत्थान करना ज़रूरी होता है।

उदाहरण के लिए, बच्चे को निश्छल भाव से तितली के पंख नोचते, चींटियों को कुचलते, या किसी को निश्छल भाव से टोली से बाहर करते देखकर, “यही है दिव्य क्षेत्र की निश्छलता” ऐसा सोचने वाला कोई नहीं होगा, है न।

असेंशन वह शब्द है जो मनुष्य के अपने सच्चे दिव्य रूप में जीने की ओर इशारा करता है।

इसलिए अगर तुम देखो कि खुद समेत कोई निश्छलता का ग़लत अर्थ ले रहा है, तो उस व्यक्ति की निश्छलता विवेक में जड़ जमाई निश्छलता में ऊपर उठ सके, इसके लिए उसके मन का मार्गदर्शन करो, प्रार्थनामय हृदय के साथ।

और अगर कोई ऐसा सोचे, “अचानक निश्छल बन जाना भला कैसे संभव है”, तो वह व्यक्ति विवेक को विशेष ज़ोर देकर निखारे, तो आगे चलकर उसका मन निश्छल बनता जाता है।

यहाँ तक बता दिया, तो अब समझ गए होगे।

हाँ, ठीक।

क्योंकि विवेक और निश्छलता एक ही जड़ और एक ही स्रोत से निकले हुए रूप हैं, और जब वे आपस में घुल-मिलकर एक सिक्के के दो पहलू बन जाते हैं, वही चेतना असेंशन वाली मनोदशा है।

निश्छलता को चरम तक ले जाओ तो दिव्यता तक पहुँचते हो, और विवेक को चमचमाता निखारो तो वह भी दिव्यता तक पहुँचाता है।

इसलिए मनुष्य अगर निश्छलता और विवेकशील गुणों में सामंजस्य बिठा सके, तो सबको जीवंत करने वाली दिव्यता को प्रकट करके जी सकता है।

हर कोई।

और वह भी ज़रूर।

इसकी कुंजी है, रोज़ की साँस को धीमा करके ब्रह्मांड में व्याप्त जीवन-स्पंदन से तालमेल बिठाना।

जिसे मामूली समझा जाता है, उस “रोज़ की साँस” में थोड़ा-सा ध्यान देने भर से, सबके लिए असेंशन का अनुभव करने का युग आ गया है।

इसलिए संकोच मत करो, गहरी साँस के ज़रिए असेंशन से होने वाले बदलाव को महसूस करके देखो।

उस समय (गहरी साँस के दौरान), हो सके तो सकारात्मक गूँज वाले शब्द, जितना हो सके लयबद्ध ढंग से मन में लाओ, और उसी लय पर साँस लो, यह अच्छा है।

उसके ठोस उदाहरण के बारे में, फिर कभी, जब संयोग, समय और स्थान मेल खाएँ, तब बात करेंगे।

तो, आज की बात यहीं समाप्त। (समाप्त)

 

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

Angelusbell

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वीडियो एक-एक करके जारी किए जाएँगे।

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