जल-विभाजक के युग में (पूर्वार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
★मानव-दृष्टि को स्थापित करने का युग
तुमसे फिर कहने की ज़रूरत नहीं, पर पृथ्वी की मानवता पवित्र-आत्मा वाले जीवन के प्रकाश को अपना मान पाती है, या शरीर (अपूर्ण व्यक्तिगत देह) को ही स्व मानने वाले विचार को अपना मानती रहती है, इन दोनों में से किस पहचान को चुना जाता है, यही पृथ्वी के भविष्य को बचाए रखने या न रखने का जल-विभाजक बना हुआ है।
तुम पृथ्वी की मानवता के जीवन का पानी विनाश की दिशा और नवजन्म की दिशा में से किस ढलान को चुनकर बहने जा रहा है, इसे केवल सौर-मंडल और आकाशगंगा के तारे ही नहीं, अनेक आकाशगंगाओं में रहने वाली ब्रह्मांड की मानवता सावधानी से देख रही है।
इस तरह पृथ्वी की गतिविधि को बाहर से देखने वाली आँखें अनेक हैं, यह अब तक पृथ्वी के ज़्यादातर लोग नहीं जानते थे, है न।
पृथ्वी-लोक का भाग्य विनाश और नवजन्म में से किस दिशा में जाता है, इसका तारों की गति पर पड़ने वाला प्रभाव तुम लोगों के सोचने से कहीं ज़्यादा विशाल है।
इसलिए हर तारे पर रहने वाली ब्रह्मांड की मानवता, जैसे तुम लोग अपने पड़ोसी क्षेत्र की स्थिति को साँस रोककर देखते हो, और जैसे नन्हे बच्चे के विकास को देखने वाली आसपास की स्नेह भरी आँखें, वैसे ही तुम लोगों की चेतना की दिशा को कभी न बदलने वाले प्रेम के प्रकाश में लपेटते हुए देखती और निहारती आई है।
तो इस युग में जी रहे पृथ्वी के सब लोग जल-विभाजक बनी पहाड़ की चोटी पर खड़े हों, ऐसा है।
तुम लोग किस ढलान को चुनते हो, इसी से तय होता है कि अब तक का जीवन-ढंग वैसा ही जारी रहेगा, या जीवन के प्रकाश को ही स्व मानकर जीने वाले महान सामंजस्य की दिशा में बढ़ा जाएगा।

यह, जैसा शुरू में भी कहा, इस पर निर्भर है कि तुम अपने को कैसा अस्तित्व मानते हो।
आज का युग वह समय है जब हर कोई अपनी मानव-दृष्टि को फिर से देखे, और किसी और की नहीं, अपनी ही दृढ़ मानव-दृष्टि को मज़बूती से याद करके पकड़े, और उसे अपने में प्रकट करने की सही घड़ी भी है।
★मानवता का मूल स्वभाव
मूल रूप से पृथ्वी की पूरी मानवता ऐसी दिव्य मानवता है जो जीवन के प्रकाश को स्वच्छंद रूप से काम में लाकर सामंजस्यपूर्ण दुनिया रचने के लिए जी रही है।
अब तक कई बार बताया है, पर दिव्यता ही तुम लोगों का सार, तुम्हारा मूल स्वभाव थी।
इसलिए असल में अपूर्ण मनुष्य होना ही नहीं चाहिए, पर तुम लोगों की पाँच इंद्रियों पर प्रक्षेपित वास्तविकता ऐसी नहीं दिखती, इसका कारण, जैसा हमेशा कहता हूँ, यह है कि अपने मूल स्वरूप को भूले लंबा समय हुआ, उन विचार-आदतों का संचय तुम लोगों के सच्चे स्व (जीवन के प्रकाश) को याद करने में बाधा डालता आया है।
तुम लोगों में अब भी मन में कहीं, आदत के विचारों को अपने जीवन का अधिकार सौंपकर, सत्य को विकृत करने वाली पहचान को स्वीकार कर लेने वाली जगह है।
इसलिए प्रकट अपूर्णता को “कोई चारा नहीं” कहकर हार मान लेना, और “मनुष्य हैं तो इतना तो होगा ही,” या “आख़िर मनुष्य ही तो हैं” कहकर बस एक-दूसरे को दिलासा देकर ख़त्म हो जाने वाला हिस्सा दिखता है, यही बात है। (अगली बार जारी)






