किसी भी चीज़ से न डगमगाने वाली अपनी धुरी रखने के लिए
प्रकाशित अद्यतन
अगर तुम्हें लगता है कि “अब तक जिसे मैं ‘मैं’ मानता था वह चेतना, किसी भी तरह ‘मैं’ नहीं लगती”, तो “मैं वास्तव में कौन हूँ?” यह अपने मन की गहराई से पूछकर देखो।
तब, तुम्हारे जीवन का प्रकाश, तुम्हारे अंतर्ज्ञान के रूप में उसका उत्तर थोड़ा-थोड़ा, टुकड़ों में बताएगा।
और, जब तुम्हारी चेतना का एंटीना, अपने जीवन के स्रोत की ओर मुड़ेगा, तब तुम्हारा हर दिन बोधों का ख़ज़ाना बन जाएगा।
ऐसा हो जाए, तो तुम्हारे जीवन में लगभग हर दिन नए बोध होंगे, बिंदु और बिंदु रेखा से जुड़ेंगे, रेखा और रेखा मिलकर त्रि-आयामी आकार बनेंगे, उस अवस्था में पहचाना जा रहा आकार आयामों की गहराई के साथ दिखने लगेगा, और तुम बहु-आयामी ब्रह्मांड के स्वरूप तक को, मन की गहराई के ब्रह्मांड में देख सकने लगोगे।
पृथ्वी पर रहने वाले बहुत से लोग अभी, दूसरों से भावनाएँ झकझोरवाते हुए, या समाज की गतिविधियों से जीवन-यापन की चिंता महसूस करते हुए जी रहे हैं न।
यह सच्चे स्व को न जानने के कारण होने वाली घटना है।
सच्चा स्व, भौतिक शरीर नहीं।
सच्चा स्व, स्वयं जीवन का प्रकाश है।
जीवन के प्रकाश के महान मूल ने ब्रह्मांड रचा।
वही तुम्हारे जीवन का स्रोत है।

तुम्हारे जीवन के स्रोत में, तुम्हारे जीवन के प्रकाश का प्रकाश-स्रोत है न।
और, भौतिक शरीर में समाकर जी रही तुम्हारी चेतना, उस प्रकाश-स्रोत से निकली प्रकाश की एक किरण है।
इसे पानी से तुलना करें, तो जीवन के विशाल महासागर को बनाने वाली जीवन की एक बूँद भी कह सकते हैं।
जीवन की गूँज को भीतर और भीतर टटोलते जाओ, तो इस तरह सब कुछ को अस्तित्व देने वाली मूल शक्ति में लौट आते हो।
पृथ्वी के लोग अभी, इसी तरह अपने जीवन के मूल को याद करने की कोशिश कर रहे हैं।
क्या? ऐसी बात में रुचि रखने वाले लोग कम हैं?
हा हा। मनुष्यों के आत्मिक आयाम की बात है, इसलिए ऐसा कहे जाने पर भी समझ नहीं आता न। क्षमा करना।
लेकिन देखते रहना।
हर व्यक्ति के लिए, चाहे या न चाहे, “मैं वास्तव में कौन हूँ” यह जाने बिना न रह पाने का समय आएगा।
आसपास के बहुत से लोग जब “मनुष्य वास्तव में कौन है” यह जान चुके होंगे, तब भी “यह भौतिक शरीर ही मैं हूँ” कहकर ज़िद करते हुए, बिल्कुल अंत तक घिर जाने के बाद ऐसी “सच्चे स्व की खोज” करो, तो मन में फ़ुरसत नहीं रहेगी न।
इसीलिए कहते हैं, “अभी से कर लेना अच्छा है”।
लेकिन, कैसे जीना है इसका अधिकार हर एक व्यक्ति के पास है।
कोई भी, कुछ भी तुम लोगों पर थोपता नहीं।
लेकिन पृथ्वी के मनुष्यों की स्वार्थी जीवन-शैली के कारण, पृथ्वी तेज़ी से अंत वाले रूप के क़रीब जा रही है।
समय इंतज़ार नहीं करता।
पृथ्वी ब्रह्मांडीय समाज में शामिल होने की दिशा में, चाहे-अनचाहे बढ़ रही है।
उस नए संसार में रह सकने की शर्त है, मनुष्य के जीवन का सार क्या है यह जानकर, उसे अपने विचारों, वचन और व्यवहार में प्रकट करके जीना।
बेशक, पृथ्वी पर विकास को ठुकराने वाले के लिए भी रास्ता तैयार है।
उसके बारे में, अगली बार बताएँगे।






