उत्तर कोरिया की गतिविधि के संबंध में (उत्तरार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
★उत्तर कोरिया की गतिविधि से ज़्यादा जापान के राजनेताओं के वचन-कर्म पर निगरानी की नज़र रखें
और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उत्तर कोरिया की गतिविधि वग़ैरह से ज़्यादा, जनता की संकट-भावना भड़काकर शत्रुता उकसाने वाले राजनेताओं के वचन-कर्म पर ही ध्यान देना चाहिए।
तुम लोगों में से हर एक, जापान शांतिपूर्ण राष्ट्र के रास्ते से दूर होने वाली हलचल में न बहे, इसके लिए दिव्य चेतना बनाए रखकर जीते रहो, तो विश्व-स्थिति चाहे किसी भी दिशा में जाए, पहले ही चेतना का विकास पा चुके तुम लोगों को छूने वाला कुछ नहीं।
इसलिए तुम लोग निश्चिंत मन से, सब लोगों में निहित पुरुष-ऊर्जा और स्त्री-ऊर्जा सामंजस्य में प्रकट हों, इसके लिए पहले खुद आगे बढ़कर मानस और शरीर के यिन-यांग सामंजस्य का प्रयास करो, और शांत मन को अपने भीतरी ब्रह्मांड में फैलाओ।
और उत्तर कोरिया की ओर से देखें, तो “हम परेशानी पहुँचाएँ तो भी सैन्य प्रतिशोध की घोषणा न करने वाला सुविधाजनक (परिपक्व) देश जापान है,” इस कारण से जापान के विशेष आर्थिक क्षेत्र में मिसाइल गिराना या जापान के ऊपर से मिसाइल गुज़ारना जैसी हरकतें करने का पहलू भी है, इसलिए अब तक की तरह जापान सरकार शब्दों के विरोध तक सीमित रहे, यही अच्छा है।
और जापान की जनता के रूप में, देशों के बीच के मनोवैज्ञानिक युद्ध में फँसे बिना, पृथ्वी के सब लोगों की दिव्यता को स्वीकार करके, शत्रु को न मानने वाला मन रखना अनिवार्य है।
क्योंकि युद्ध शत्रु को मानने वाले मन और मन के टकराव के सिवा और कुछ नहीं।

★हमेशा केवल सार को देखते हुए जीएँ
तुमसे कई बार बताया है, मनुष्य के जीवन का मूल स्रोत, एक भी अपवाद के बिना, ब्रह्मांड के महाजीवन नामक जीवन के मूल स्रोत के प्रकाश के भीतर है।
इसलिए उस मूल सिद्धांत को खोए बिना जीते रहो, तो वे लोग शाश्वत जीवन का बोध करके, भौतिक देह की सुरक्षा से न चिपकने वाला निःस्वार्थ सच्चा हृदय याद कर सकते हैं।
और व्यर्थ भय से प्रभावित न होने वाले अडिग मन को धुरी बनाकर कुशल-क्षेम की अवस्था में जी सकते हैं।
ऐसे लोग एक-दो करके बढ़ते जाएँ, तो चिंता, भय और अविश्वास के विचारों में बहने वाले लोग कम होंगे, और सत्य से मुँह मोड़कर वचन-कर्म करते आए लोग भी न जाने कब विवेक पर आधारित व्यवहार कर पाने लगेंगे।
बहरहाल, तुम लोग विश्व-शांति की जड़ कही जा सकने वाली “पूरी मानवता की दिव्यता को पुनर्जीवित करना” इस मूल को खोए बिना, अपने जीवन के प्रकाश को चमकाते हुए जीते रहो, इतना ही काफ़ी है, यही बात है।
कृपया यह सिद्धांत मत भूलना।
क्योंकि सतही दुनिया का अंत जितना निकट आता है, नई दुनिया की भोर उतनी ही सहज सुबह बनती जाती है। (समाप्त)







