बुद्धि का आयामी उत्थान (5)
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(पिछली बार से जारी)
★जीवन-ऊर्जा के ग़लत उपयोग से स्नातक होने के लिए
आत्मविश्वास रखो, दृढ़ विश्वास से भरकर, स्वीकार करो कि तुम्हारा मूल स्वरूप ब्रह्मांड को रचने वाली अनंत महान प्रज्ञा है।
असल में ऐसा ही है, फिर भी ऐसा नहीं मानते, इसलिए “ऐसा नहीं” वाले अपने आप की खाल ओढ़े बैठे हो।
जैसे साँप और कीट केंचुली उतारकर रूप बदलते जाते हैं, वैसे ही जिसे तुम अपना आप मानते थे, उस “अपने रूप” का आयामी उत्थान करते जाओ।
मनुष्य की बुद्धि का उपयोग ठीक ऐसी ही बात के लिए होना चाहिए।
पर देखो क्या हो रहा है?
सब लोग केवल खुद को बचाने और खुद का बचाव करने में ही बुद्धि लगा रहे हैं।
इसी को “जीवन-ऊर्जा का ग़लत उपयोग” कहते हैं।
बहुत से लोग जीवन-ऊर्जा का ग़लत उपयोग करके, खुद को नीचा दिखाने और दूसरों को पीड़ा देने में लगे रहते थे।
अब इस तथ्य को सीधे देखने का सही समय आ गया है।
तुम ऐसे तथ्यों को बस तथ्य मानकर, शांति से ऊपर से देख सकते हो।
जैसे सड़क से गुज़रती गाड़ियों को देखते हो, जैसे आकाश में बहते बादलों को निहारते हो।
उस समय तुम्हारी चेतना जीवन के मूल स्रोत में होती है।
देखो, धरती की ओर देखो।
तुम्हारी रची प्रतिछवियाँ तरह-तरह से जीवन की गतिविधियाँ चला रही हैं, है न।
कुछ प्रतिछवियाँ ऐसी हैं जो जीवन-ऊर्जा का सही उपयोग कर रही हैं, जिसमें अपना आनंद दूसरों के आनंद से भी जुड़ता है।
वहीं दूसरी ओर, कुछ प्रतिछवियाँ ऐसी हैं जो जिसे अपना आनंद मान बैठी हैं, वह असल में अपने और दूसरों को चोट और हानि पहुँचाने वाला है, यह जाने बिना, अहं की इच्छाओं की पूर्ति में लगी रहती हैं।
केवल उन-उन दृश्यों को काटकर देखो, तो मन “हाय! कुछ करना होगा!” कहकर उतावला हो सकता है, लेकिन अनंत जीवन के प्रवाह से देखो, तो वह नगण्य, क्षणिक घटना है, और सब कुछ ज़रूर महान सामंजस्य में पहुँचेगा, यह तय तथ्य है, यह समझ आता है न।

★मनुष्य के विकास का कोई अंत नहीं
हर मनुष्य मूल रूप से ऐसे अनंत दृष्टिकोण से सब कुछ ऊपर से देखते हुए जी सकता है।
ऐसी चेतना की दृष्टि रखो, तो धरती पर मनुष्यों का एक-दूसरे से झगड़ना, अपने और दूसरों का अपमान करना, प्रकृति को मैला करके मालिक की तरह व्यवहार करना, और जीवों को घुटनों तले दबाकर उनसे मनमाना व्यवहार करने की कोशिश करना, यह कितनी बड़ी बर्बादी है, यह दिखने लगता है।
इस तरह देखने से, “मैं, मैं” करके केवल अपने बारे में सोचने वाले संकीर्ण व्यक्तिगत स्व से स्नातक होते जा सकते हो।
अभी इसे केंचुली उतारने के शब्द से कहा, लेकिन मनुष्य कितना भी श्रेष्ठ बन जाए, उसके आगे भी और है।
ब्रह्मांड का मूल, जीवन का स्रोत, स्थिर और ठहरा हुआ मृत अस्तित्व नहीं, बल्कि हमेशा फैलता और विकसित होता, जीवन-शक्ति का मूल कहे जाने योग्य अस्तित्व है।
इसलिए तुम लोग जितने श्रेष्ठ होते जाते हो, जीवन का स्रोत भी उतना गहरा, विस्तृत और बड़ा होता जाता है।
मनुष्य की बुद्धि मूल रूप से सृजन की ऐसी मूल ऊर्जा से सीधे जुड़ी है।
इसलिए केवल छोटी चतुराई चलाना ही बुद्धि नहीं, और केवल ऊपरी ग्रहण-शक्ति ही बुद्धि नहीं।
स्वयं ब्रह्मांड का विकास करके, महान सामंजस्य वाले संसार को फैलाने की क्षमता ही वह शक्ति है जिसे बुद्धि कहा जाता है।
इस बात को अच्छी तरह समझो।
ऐसा करो, तो तुम लोगों में निहित अनंत सृजन-शक्ति सक्रिय होगी, और तुम पृथ्वी नाम के उस ग्रह के आकाश-धरती को, जिस पर तुम हो, महान सामंजस्य वाला संसार बनाने में योगदान दोगे। (समाप्त)






