सापेक्षता से समग्रता की ओर
प्रकाशित अद्यतन
★सापेक्षता वाली चेतना में रहो तो
जीवन के सत्य को पूरी तरह भूल चुके लोगों को, सच्चा सत्य बताना कठिन है न।
क्योंकि जोश दिखाओ तो सामने वाला ठंडा पड़ जाता है, और पीछे हटो तो सामने वाला आगे बढ़ आता है, इस तरह मन का ठीक-ठीक मेल बहुत कम होता है।
इस बारे में तुम लोगों से यह जानने की इच्छा है कि, भले ही बात करने वाला सामने एक ही व्यक्ति हो, किसी ख़ास व्यक्ति में डूबे (उलझे) बिना, पूरी मानवता से बात कर रहे हो, ऐसे बताना अच्छा है।
ऐसा करने से क्या होता है, तो बात बताने वाले तुम लोगों का मन, शुरू से ही किसी ख़ास व्यक्ति के प्रति आसक्ति रहित मनःस्थिति में होता है, और ब्रह्मांड में सर्वत्र व्याप्त सार्वभौमिक सत्य को प्रकाशित कर सकता है।
कहें तो, यह अजेय मनःस्थिति है।
क्योंकि तुम लोग बस प्रकाशित हो रहे होते हो, और उस प्रकाश को पाने वाला उसे कैसे भी ले, उसके प्रति ज़रा भी आसक्ति न रखने वाली भावना में रह सकते हो।
वास्तविक समस्या के रूप में महत्वपूर्ण यह है कि किसी भी हाल में सामने वाले को समझाऊँ, या मनवाऊँ, ऐसा कभी भी न सोचना।
क्योंकि यह आसक्ति के सिवा और कुछ नहीं।
अपने आसक्ति वाले मन को न छोड़ पाने का अर्थ है कि अपना मन सामने वाले जैसे ही सापेक्षता के संसार में है, और ऐसी मनःस्थिति से सत्य कहो तो, सच्ची गूँज आसानी से नहीं पहुँचती।

★समग्रता वाली चेतना में रहो तो
मन को हमेशा समग्रता, संपूर्णता में रखना अच्छा है।
इसका अर्थ है, मन को दिव्य क्षेत्र में स्थिर रखना अच्छा है, और अगर तुम ऐसे हो, तो सामने वाले के साथ कुछ करूँ, ऐसी अहं की भावना उठ ही नहीं सकती।
उसका तरीका है, रोज़ की श्वास को धीमा और शांत रखना, और यह कर सको तो बिना किसी कष्ट के, समग्रता वाले मन में रह सकते हो।
आज की बात को मन में मज़बूती से जमाकर, आसपास के लोगों से मिलकर देखो।
तो, पता भी नहीं चलेगा और आसपास के लोग महान बनते जाएँगे।
“मैं, मैं” वाला व्यक्तिगत स्व मन खपाकर, “ऐसा कर दूँ, वैसा कर दूँ” सोचने की ज़रूरत न रहने वाली स्थिति में, अपने आप बदलता जाएगा।
यही कारण है कि निःस्वार्थ मन अजेय है।
क्योंकि “मैं कुछ करूँ” न सोचो तब भी, स्वाभाविक रूप से किया गया कर्म अपने आप स्वयं और दूसरों को महान सामंजस्य की दिशा में ले जाता है।
तुम लोग पहले से ही, केवल मौजूद होने भर से आसपास को शुद्ध करने की शक्ति रखते हो।
इस बात का गहरा बोध करके, अपने वचन और व्यवहार को जागते हुए पूरे समय, दिव्यता के साथ सुर में मिलाओ।
ऐसा करते रहो तो, “मुझे ही कुछ करना होगा” ऐसा ज़ोर लगाए बिना भी, अनजाने में सब कुछ निश्चित रूप से अच्छी दिशा में चलता जाएगा।







