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तारों के साथ संवाद के युग का द्वार खोलने के लिए

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

Voice of Space Brothers

समुद्र और चेतना का विकास (उत्तरार्ध)

प्रकाशित अद्यतन

(पिछली बार से जारी)

★देवलोक (गहरे समुद्र) में स्थित सच्चे स्व को सतही चेतना (समुद्र की सतह) पर प्रकट करके जिएँ

महासागर (सच्चा स्व) मूल रूप से अनंत करुणामय प्रेम और सृजनशीलता का भंडार है।

और जल (जीवन) वह महत्वपूर्ण तत्व है जो जीवन के मूल स्रोत के संसार को और प्रकट हुई मानवता (अपना सार भूल चुकी सतही चेतना) को आपस में जोड़ता है।

हमारे तारे के पूर्वज लाओ-त्ज़ु के छोड़े हुए शब्दों में एक है, “सर्वोच्च भलाई जल के समान है,” है न?

उसे सचमुच जीने के लिए भी, दिन-प्रतिदिन यह बोध पक्का करते जाना अच्छा है कि तुम सच में शरीर तक सीमित कोई छोटा-सा अस्तित्व नहीं हो, बल्कि तुम्हारा सार स्वयं विशाल महासागर है, और बस उस गहरे, विस्तृत मन को प्रकट करके जीने भर से, हर कोई इस दुनिया में महान सामंजस्य का संसार रचने की शक्ति पा सकता है।

इसके लिए, सबसे नीचे का गहरा समुद्र (देवलोक में स्थित चेतना) भी, ऊपर की सतह (सतही चेतना) भी, बीच का समुद्र (सूक्ष्म देह की चेतना और आत्म-देह की चेतना) भी, पूर्व के छोर से पश्चिम के छोर तक, उत्तर के छोर से दक्षिण के छोर तक, पृथ्वी के पूरे विस्तार को ढकने वाला सारा समुद्री जल अपना ही मन है, ऐसा मानकर, विश्व की समस्त मानवता की दिव्यता के पुनर्जागरण की प्रार्थना करने वाले मन से दैनिक जीवन की हर बात का सामना करते जाओ, तो न जाने कब अपने शरीर के आकार भर की सतह की लहर (व्यक्तिगत स्व के विचार) को ही अपना समझने वाली सीमित चेतना से तुम बाहर निकल आओगे, और “मैं” नाम की चेतना स्वयं महासागर (सच्चे स्व) तक फैलती जाएगी।

ऐसा करते-करते फिर, समुद्र के दायरे से भी बाहर निकलकर, धरती भी, वायुमंडल भी, जल भी, ब्रह्मांड भी, आकाश और धरती में जीने वाले सारे जीव भी, समस्त सृष्टि की हर एक चीज़ तुम्हारे ही भीतर थी, यह तथ्य एक दिन याद आने लगेगा।

ऐसी ब्रह्मांडीय चेतना तक मन को फैलाने और गहरा करने का भविष्य, तुम्हारे किए जा रहे चेतना के विकास के अभ्यास के आगे फैला हुआ है।

इसलिए मैं बार-बार कहता हूँ, प्रकट संसार चाहे किसी भी स्थिति में पहुँच जाए, कभी भी उसकी लहरों में डूबकर उनके साथ एक मत हो जाना।

और यह पहचानना कि विश्व की मानवता द्वारा उठाया गया तूफ़ानी दृश्य, प्रकट होने पर अवश्य मिट जाता है।

और शांत, स्थिर प्रार्थना को, मानवता के सार यानी दिव्यता के मन को, अपनी वर्तमान स्थिति और परिवेश में चमकाते हुए जीना महत्वपूर्ण है।

सच कहूँ तो, इस दुनिया की मानवता के झगड़े तो हैं ही, आकाशीय घटनाओं की असामान्यता भी, समुद्र का उफान भी, धरती का काँपना भी, कुछ हद तक समूची मानवता के विचारों से गहराई से जुड़े हुए हैं (यह वहाँ पीड़ित किसी व्यक्ति को दोष देने के लिए नहीं है), और जैसे ही पृथ्वी की मानवता दिव्यता को याद करके उसे प्रकट करते हुए जीने लगे, ये सब मिट जाने वाली क्षणिक घटनाएँ हैं। (समाप्त)

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

Angelusbell

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वीडियो एक-एक करके जारी किए जाएँगे।

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