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तारों के साथ संवाद के युग का द्वार खोलने के लिए

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

Voice of Space Brothers

दिव्य नेत्र की दृष्टि से जीने के लिए

प्रकाशित अद्यतन

★मन की आँख को दिव्य नेत्र में बदलें

दिव्य चेतना की आँख, यानी मन की आँख का दिव्य नेत्र बन जाना वह अवस्था है जिसमें एक ही जगह रहते हुए दूर छोर के भी छोर तक देखा जा सकता है, और साथ ही आयामों की गहराई में स्थित तरह-तरह के स्तरों के आकाश-धरती समेत सब कुछ, एक क्षण में व्यापक रूप से, समग्र और बहुआयामी ढंग से देख लेने की शक्ति होती है।

इसलिए दिव्य नेत्र वाला बन जाओ, तो अब तक के भौतिक मनुष्यों की तरह सामने के लोभ-लाभ से आँखें चुँधियाकर असफल भी नहीं होते, “बस, अब नहीं होगा!” कहकर नियति को खोलने का प्रयास भी नहीं छोड़ते, और किसी भी बात में तुरंत हाथ भी नहीं खींच लेते।

इसके अलावा, जिससे मिलते हो वह जो बात ऊपर प्रकट न करके केवल सोच रहा होता है, वह भी समझ आ जाती है, इसलिए आसानी से धोखा भी नहीं खाते।

और, पौधों और जानवरों की रक्षा करने वाली प्रकृति-आत्माओं से भी बात कर सकते हो, पहाड़ जी, नदी जी, झील जी, समुद्र जी, हवा जी और धरती जी का मन भी समझ सकते हो, और प्राकृतिक वातावरण से सामंजस्य रखने वाले विकास का ढंग समझ आ जाता है, इसलिए तारे के पारिस्थितिकी-तंत्र को तोड़े बिना, सारे जीवों के साथ मिलकर जीते और फलते-फूलते रह सकते हो।

ऐसे मन वाली मानवता ही हो जाए, तो उस तारे का महान सामंजस्य वाला रूप प्रकट करना स्वाभाविक है, है न।

ऐसा बनने के लिए दिव्य चेतना की आँख, तुम्हारी भौतिक आँख की गहराई में है।

यहाँ गहराई का अर्थ है आयामों की गहराई।

इसलिए, चेतना का विकास करके दिव्य चेतना को सतही चेतना पर तेज़ी से फैलाते जाओ, तो अपने-आप दिव्य नेत्र वाले बन सकते हो।

“ऐसा कैसे हो सकता है” सोच रहे तुममें भी, दिव्य नेत्र शुरू से ही मौजूद है।

बस, पृथ्वी-लोक में बहुत लंबे समय तक ज़मीन के नीचे घुसकर केवल सुरंग खोदते रहे, इसलिए भूल गए थे कि तुम्हारे पास उजले संसार में खड़े होकर सब कुछ देख लेने वाली आँख है।

अगर लंबे समय तक अँधेरे में रहे हों, तो आँखें अँधेरे संसार की आदी हो जाती हैं, और उजले संसार में निकलते ही आँखें चुँधिया जाती हैं, कुछ देर तक आँखें ठीक से खोली नहीं जातीं, और दृश्य भी धुँधला रहता है, ऐसा होता है न।

आज तुम लोगों की स्थिति कुछ वैसी ही है।

इसलिए, कुछ भी चिंता न करो, बस दिव्य चेतना बनाए रखो, तो तुम्हारा दिव्य नेत्र आगे चलकर फिर जाग उठेगा।

बस अभी जो करना है उसे धीरे-धीरे करते रहो, और दृश्य जगत की घटनाओं पर कभी ख़ुश कभी दुखी न होओ, और अच्छे-बुरे से न चिपको, तो।

 

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

Angelusbell

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वीडियो एक-एक करके जारी किए जाएँगे।

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