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तारों के साथ संवाद के युग का द्वार खोलने के लिए

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

Voice of Space Brothers

बचे हुए 4 महीने पार करें ~ आधुनिक नूह की नाव पर सवार होकर सब जीवित प्राणियों और पूरी प्रकृति के उद्धार के लिए (उत्तरार्ध)

प्रकाशित अद्यतन

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(पिछली बार से जारी)

★इच्छा के अनुसार नहीं, पर सोच के अनुसार बने यथार्थ की दिशा सुधारने के लिए

आज के संसार को देखकर, शरीर से चिपककर जीने वाले लोग एक स्वर में कहेंगे, “ऐसी स्थिति हो जाए, ऐसी इच्छा तो हमने ज़रा भी नहीं की थी।”

लेकिन अचेतन रूप से, आशंका और भय के विचार, या अविश्वास और शत्रुता के विचार, किसी व्यक्ति या किसी चीज़ की ओर लगातार भेजते हुए तो जीते आए हो, है न।

वे वे बातें हैं जो तुम सोचते हो, और सोचते थे।

इसका क्या अर्थ है, तो शरीर से पूरी तरह चिपकी चेतना वालों के लिए, “यह संसार ऐसा संसार है जो इच्छा के अनुसार तो नहीं बनता, पर सोच के अनुसार बनता है”, ऐसा कहा जा सकता है।

अब तक जिया हुआ अपना समय शांत मन से देखो, और रोज़ अचेतन रूप से बिताए समय में दिमाग़ से गुज़रे तरह-तरह के विचार याद करके देखो।

क्या नापसंद है, कौन अच्छा नहीं लगता, यह मज़ेदार नहीं, वह ऐसा क्यों है, यह-वह, शिकायत, असंतोष, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष और दूसरों से ऊपर दिखने के विचार, प्रकाशमय विचारों के साथ मिला-जुलाकर, अनजाने में भेजते हुए समय बिताया है, है न।

वही विचार व्यक्ति के अनचाहे भविष्य को गढ़ते हैं, और साथ ही मानवता और पूरी पृथ्वी के अँधेरे भविष्य को रचने वाली प्रेरक शक्ति बनकर, सचमुच उसे यथार्थ बनाते आए हैं।

हम देखते हैं कि बड़े भूकंपों (बड़े भू-पर्पटी परिवर्तनों), ज्वालामुखी विस्फोटों और असाधारण आँधी-तूफ़ान-बर्फ़ की गहराई में भी पूरी मानवता के विचार, वचन और कर्म का प्रभाव है। लेकिन यह बात आपदा झेलने वाले लोगों को दोष देने के लिए नहीं है।

इसका अर्थ बस यह है कि सारी मानवता के विचार आपस में इतने जुड़े हुए हैं।

इस तथ्य को गंभीरता और विनम्रता से देखना ज़रूरी है।

इसका प्रमाण यह है कि जिन ग्रहों पर सारी मानवता चेतना का विकास पूरा कर चुकी है और संसार दिव्य सभ्यता का बन चुका है, उनके आकाश-धरती में न आँधी-तूफ़ान है, न बड़े भूकंप, न ज्वालामुखी विस्फोट मानवता के जीवन को निगलते हैं, और वे ऐसे महान सामंजस्य वाले काल-स्थान में जी रहे हैं जहाँ मानवता के बीच असामंजस्य भी कहीं दिखाई नहीं देता।

इसका कारण यह भी है कि वे प्रकृति के साथ सामंजस्य में जी रहे हैं, और यह भी कि उस ग्रह की मानवता की चेतना सामंजस्य में है, इसलिए मैल को धोकर बहाने की ज़रूरत नहीं (प्राकृतिक आपदा होने का कोई कारण नहीं)।

★चाहे कैसी भी स्थिति हो, दिव्य चेतना से संसार को देखो

शुरुआती बात पर लौटें, तो सब मनुष्यों के जीवन की जड़ में स्थित दिव्यता को स्वीकार करके, महाब्रह्मांड को सामंजस्य से चलाने वाले नियमों और सार्वभौमिक सत्य को जीवन-ढंग का आधार बनाकर, हर पल, हर पल जीवन के प्रकाश (अनंत सृजनशीलता) का उपयोग करते हुए जीना, पुराने नियम (ओल्ड टेस्टामेंट) में वर्णित नूह की नाव पर सवार होकर जीना है।

अतीत की भौतिक जीवन-दृष्टि, मनुष्य-दृष्टि, संसार-दृष्टि आदि को हमेशा अटल सिद्धांत की तरह सँजोकर, पुराने ढर्रे वाले सामान्य ज्ञान को कसकर पकड़े रहो, तो अनजाने में “बिना चाहे यथार्थ” रच लेते हो, और यह केवल अपने भाग्य पर ही नहीं, पूरी पृथ्वी के भाग्य पर भी असर डाल सकता है।

इसलिए तुम लोगों जैसे, जिनकी चेतना नूह की नाव पर सवार हो चुकी है (दिव्य क्षेत्र में प्रवेश कर चुकी है), वे कुछ भी हो जाए, मन को न पीड़ा हो न चोट लगे, ऐसी स्थिति से संसार की ओर हाथ बढ़ाकर, एक भी अधिक व्यक्ति को ऊपर खींच लें, यही चाहता हूँ।

अभी मैंने कहा, “कुछ भी हो जाए, मन को न पीड़ा हो न चोट लगे, ऐसी स्थिति से”, लेकिन पिछले जन्मों के कर्म-बंधनों के कारण अपने शरीर को चोट लगना, या रहने का परिवेश टूट जाना, ऐसा भी हो सकता है। लेकिन यह उस व्यक्ति को दोष देने के लिए नहीं है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि मन को पीड़ा या चोट न लगे, तो किसी भी स्थिति से कितनी भी बार उठकर, ऊपर चढ़कर, शरीर का स्वास्थ्य फिर से पाया जा सकता है, या रहने का परिवेश फिर से खड़ा किया जा सकता है।

दुर्भाग्यपूर्ण अवस्था का अनुभव करना, पिछले जन्मों से जमा होते आए कर्मों के खिलकर झड़ जाने का रूप भी है, और किसी को दोष देने के लिए नहीं, इसलिए उसे खिलकर झड़ जाने दो।

वहाँ अटककर शिकायत, असंतोष और कमी के विचार भेज देते थे, इसीलिए बुरा भाग्य दोहराया जाता रहा; नकारात्मक पहलू में उलझे और चिपके बिना (उसे पकड़े बिना), इस पल आगे की ओर वाले विचार लगातार भेजते जाओ, तो आने वाले कल का भाग्य प्रकाश की दिशा में मुड़ता जाता है।

बेशक, ऐसे लोग भी होते हैं कि पास-पड़ोस को भारी नुकसान हो, फिर भी केवल उनके घर को थोड़ा ही नुकसान हो, या उन पर कोई असर ही न पड़े।

लेकिन नुकसान हुआ या नहीं, इससे किसी व्यक्ति को नहीं आँका जा सकता, और यह बात नुकसान झेलने वालों को दोष देने के लिए भी नहीं है।

उससे अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि चाहे कैसी भी स्थिति हो, दिव्यता में जड़ जमाए आगे की ओर वाले विचार लगातार भेजते रहो, और उन्हें वचन और कर्म में प्रकट करो।

आगे कितने साल लगेंगे पता नहीं, पर तूफ़ान के इस दौर को बस पार कर लो, तो शांत, पूर्ण सामंजस्य वाला संसार आएगा।

इसके लिए भी, इस वर्तमान पल को पूरी तरह दिव्य क्षेत्र की चेतना से देखो, और “सब कुछ अपनी सही जगह पर बैठ जाएगा, और ज़रूर सब कुछ अच्छा होगा” यह आशा का विचार लगातार रखो।

बस ऐसा करते रहो, तो चाहे कितनी भी कठिन स्थिति हो, मन को उजला रखकर दृढ़ता से जीने की शक्ति उमड़ आती है।

अभी कही बात के विवरण, आगे ज़रूरत न हो तो नहीं बताऊँगा, लेकिन अगर उसकी ज़रूरत बढ़ जाए, तो कभी किसी अवसर पर बात करेंगे।

क्योंकि यह कोई भी कर सकता है। (समाप्त)

 

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

Angelusbell

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वीडियो एक-एक करके जारी किए जाएँगे।

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