बचे हुए 4 महीने पार करें ~ आधुनिक नूह की नाव पर सवार होकर सारे जीवों और पूरी प्रकृति के उद्धार के लिए (मध्य भाग)
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(पिछली बार से जारी)
★प्रकृति-जगत और मानवता को जीवन का प्रकाश बाँटें
पिछले कुछ दशक भी उथल-पुथल का समय थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पृथ्वी उससे भी बड़े तीव्र बदलाव के दौर में प्रवेश कर चुकी है।
हाल ही में आख़िरकार वह समय आया है जब यह तथ्य बहुत से लोगों को महसूस होने लगा है।
और, जब उन्हें लगेगा कि “कुछ असाधारण हो रहा है”, तो उस बदलाव को चिंता से लेकर डगमगाने वाले मन के लोग भी शायद निकलें।
क्योंकि भौतिक शरीर को ही अपना स्व मान बैठे मन को केवल बहुत उथले, ऊपरी बदलाव ही महसूस होते हैं, इसलिए वह केवल बिगड़ता हुआ दिखने वाला पक्ष ही देख पाता है, और आँखों से दिखने वाले दृश्य जगत के ऊपरी बदलाव, उथल-पुथल, परिवर्तन और विनाश के सामने केवल चिंता और भय ही आगे और प्रबल हो जाते हैं, और चेतना भावनात्मक विचारों के भँवर में खिंच जाती है।
ऐसे दुष्चक्र में फँसे लोगों के मन में भविष्य की आशा जगाने के लिए भी, बार-बार जीवन का प्रकाश बाँटना ही तुम लोगों का रोज़ का आत्मिक काम (दिव्य कार्य) है।
प्रकृति का प्रकोप हर साल तुम लोगों के जीवन-वातावरण को तहस-नहस कर रहा है, है न।
“मापन के इतिहास में पहली बार” यह शब्द इसी साल कई बार सुन चुके हो।
और सच में भारी कष्ट में पड़े बहुत से लोग भी हैं।
लेकिन जल, अग्नि, वायु और धरती, कोई भी जीवों को कष्ट देने का इरादा बिल्कुल नहीं रखते।
“चलो थोड़ा सताएँ”, ऐसा प्रकृति ज़रा भी नहीं सोचती, लेकिन हम देखते हैं कि पूरी मानवता के विचारों की गड़बड़ी प्रकृति के काम पर भी असर डाल सकती है। लेकिन यह बात पीड़ित हुए लोगों को दोष देने के लिए नहीं है।
इसलिए हवा भी, बारिश भी, धरती भी, उफनते हुए आँसू बहा रहे हैं।
हवा, पानी, पहाड़, सब रो रहे हैं।
मानवता की चोटों से होने वाला कष्ट भी है, लेकिन साथ ही उन पर चोट पहुँचाना न चाहते हुए भी, आकाश और धरती के बीच जीने वाले जीवों को कठिनाइयाँ देने की, दुखभरी भूमिका डाल दी गई है।

★पृथ्वी की मानवता द्वारा रचे गए यथार्थ के सामने
अब ही वह समय है जब मानवता मन को नया करके, प्रकृति के हर काम से, मानवता द्वारा अब तक किए गए विनाश और प्रदूषण के लिए क्षमा माँगे, और इस तथ्य के लिए हृदय से कृतज्ञता अर्पित करे कि वह पूरे प्रकृति-जगत के सहारे जी रही है।
ऐसा करना ही प्रकृति-जगत के घावों को भरने, गंदगी को हल्का करने, और मानवता को आगे भी मनमाने ढंग से अंधाधुंध विकास करने या प्रदूषक बहाने से रोकने की शक्ति बनता है।
यहाँ फिर से कहता हूँ, हम देखते हैं कि तूफ़ानी बारिश और बड़े भूकंप जैसी बातों की गहराई में, वे केवल प्राकृतिक घटनाएँ ही नहीं हैं, बल्कि पृथ्वी के आकाश और धरती के बीच जमा पूरी मानवता के कर्म के विचारों का मिटते जाने वाला रूप भी उनसे जुड़ा है। यह बात पीड़ित हुए हर एक व्यक्ति को दोष देने के लिए नहीं है।
इसीलिए यह ऐसी चीज़ भी है जिसे सारी मानवता के विचार हल्का कर सकते हैं।
मानवता के कर्म के ढहते समय, प्रकृति असामान्य हलचल करती है।
वह ऊर्जा कभी-कभी प्रकृति की बड़ी शक्ति बनकर भी प्रकट होती है।
यही प्राकृतिक आपदाओं का सत्य है।
ऐसे प्राकृतिक प्रकोप का सामना होने पर, पीड़ित हुए बहुत से लोग गहरे दुख और असहायता में, अपनी बनाई चीज़ों के तहस-नहस हो जाने या अपने प्रियजनों के जीवन के आकाश में उठा लिए जाने पर विलाप करते हैं, प्राकृतिक प्रकोप के निशान देखकर लाचार खड़े रह जाते हैं, या उलटे कठिनाई का सामना करके साहस से जूझते और लड़ते हैं, लेकिन एक कदम पीछे हटकर, ऐसी घटनाएँ क्यों हो रही हैं, ऐसी स्थिति को शांत करने के लिए क्या करना चाहिए, इसे शांति से जीवन-सिद्धांत की दृष्टि से देखकर, स्थिति को जड़ से बेहतर बनाने के उपाय करने वाले लोग कम हैं।
आध्यात्मिकता के संपर्क में आए लोगों में से कुछ, “यह पृथ्वी के नए जन्म के लिए बड़ी सफ़ाई है”, या “यह आर्मागेडन है”, या “यह प्रकृति का मानवता से बदला है” सोचकर संतुष्ट हो जाते हैं, लेकिन असल में कहें तो इनमें से कोई भी सही नहीं है।
कुछ थोड़े करीब भी हैं, लेकिन अभी जो गिनाए, वे सत्य को ज्यों-का-त्यों दिखाने वाले शब्द नहीं हैं।
और सच्चा उत्तर है, “पृथ्वी की मानवता के विचार, वचन और कर्म द्वारा रचा गया यथार्थ”।
“यह तो बड़ी रूखी बात है” ऐसा लगता है?
लेकिन यह किसी को दोष देने की बात नहीं है, बल्कि इसका अर्थ है कि इसीलिए सारी मानवता के विचार भविष्य को बदल सकते हैं। (अगली बार जारी)







