सत्य और पृथ्वी की मानवता के एकीकरण की ओर
प्रकाशित अद्यतन
★अनुभव (अभ्यास) के बिना सत्य “काग़ज़ पर बना पकवान” है
मान लो कोई सत्य के प्रति जागा और उसे अपनाने के लिए किसी साधन से उसे सीखा।
लेकिन अगर उस व्यक्ति की मनोदशा “अनुभव-रहित सीख” से संतुष्ट होकर वहीं ठहर जाए, तो उसमें से ज़्यादातर आत्मसात नहीं होगा।
क्योंकि अनुभव-रहित सीख “मन कहीं और” वाली अवस्था में सिर्फ़ सुने हुए शब्द, सिर्फ़ पढ़े हुए अक्षर, सिर्फ़ देखे हुए नमूने जैसी है, जो स्मृति में “चाय गँदली करने” भर की रहती है।
अभी इस्तेमाल करके लगा, “चाय गँदली करना” (जापानी मुहावरा: लीपापोती करना) भी दिलचस्प शब्द है।
इसका मतलब “नौसिखिया मानो जानकार की तरह माच्चा चाय फेंटकर, असली जैसा दिखाकर लीपापोती करे” से आया है, और उसी तरह की बातों के रूपक के रूप में इस्तेमाल होता है।
“चेतना-विकास के रास्ते पर लीपापोती करना” भी यही है कि खुद सत्य को साकार किए बिना, सिर्फ़ दिमाग़ से जानी बात को ऐसे बरतना मानो सचमुच जानते हों। इससे मुश्किल से मिली सीख बेकार जाती है।
किसी ने सच्चे अर्थ में सत्य अपनाया, इसका मतलब है कि उसे अपने तन-मन से अनुभव करके खुद प्रकट कर सकने पर ही कहा जा सकता है कि वह क्या है यह समझा। अनुभव (कर्म) रहित ज्ञान कितना भी दिमाग़ में ठूँस लो, वह सिर्फ़ जानना भर है।
इसलिए सुना, पढ़ा, देखा, इसलिए वह सचमुच आत्मसात हो गया, ऐसा नहीं है, यह एक बार फिर खुद पर लागू करके विचार करो, और अपने अस्तित्व से निकलने वाली गूँज हमेशा सत्य की गूँज बनी रहे, सत्य हमेशा भाव, मुँह से निकलने वाले शब्द, बर्ताव, आभा, कर्म आदि में भी प्रकट रहे, इसके लिए हर समय खुद को माँजना, गहरा करना, ऊँचा उठाना बहुत महत्वपूर्ण है।
एक पूरक बात जोड़ूँ तो “जानकारी बढ़ाने के लिए उपन्यास पढ़ना, मन समृद्ध करने के लिए संगीत सुनना” जैसी बातें बिल्कुल अलग आयाम की हैं, इसलिए इन्हें मत मिलाना।

★पृथ्वी की मानवता के सत्य के प्रति जागने का अवसर
आत्मा के बचपन से किशोरावस्था में रहने वाला व्यक्ति अपने अनुभव से सत्य और असत्य का भेद सीखता है और खुद में प्रकट सत्य के स्तर को गहरा करके समग्र सामंजस्य को समृद्ध करने वाला जीव है, लेकिन अभी अफ़सोस, इस चरण से स्नातक हो चुकी चेतना वाले पूरी दुनिया को ऊपर खींचने की स्थिति तक नहीं पहुँचे हैं।
यह ऐसा है जैसे सपने में डूबे व्यक्ति तक आवाज़ मुश्किल से पहुँचती है।
लेकिन जल्द ही सब पृथ्वीवासियों का नशा (भ्रम) उतरेगा, “अरे, अरे, बाल-बाल बचे” कहकर उन्हें एहसास होगा कि वे खतरनाक खाई के किनारे थे, और मिले हुए जीवन का उपयोग करके जीने के चरण में जाने का समय आएगा।
यह वह समय भी है जब एहसास होता है कि जो नहीं है समझा था वह है, और जो है समझा था वह नहीं था।
और दूसरे शब्दों में, यह सत्य और असत्य का अंतर समझने वाला बनना भी है, जीवन के प्रकाश से निकले विचार-वचन-कर्म और शरीर से कसकर चिपके विचार-वचन-कर्म में भेद कर पाना भी है, और यह एहसास होने का समय भी है कि सिर के बल खड़े होकर दुनिया को उल्टा देख रहे थे।
पृथ्वी पर आने वाले 100 से 150 साल, आत्मा की वृद्धि की दृष्टि से, बचपन से किशोरावस्था होते हुए युवावस्था की ओर एक साथ तेज़ी से बढ़ने का युग कहा जा सकता है।
उसका बड़ा अवसर, वह घड़ी है जब लंबे समय से तुम्हारी रक्षा करते आए संरक्षक देवता-आत्माएँ और हम ब्रह्मांडीय मानवता भौतिक रूप में, सार्वजनिक रूप से पृथ्वी के देहधारी मनुष्यों की आँखों के सामने प्रकट होंगे।
दूर अतीत में, जब हमारा तारा पृथ्वी की तरह अपनी ही सभ्यता से विनाश की कगार पर भटक रहा था, अचानक विकसित तारे की मानवता प्रकट हुई, सारी आक्रमण-शक्ति और विनाशक उपकरण निष्प्रभावी हो गए, और जब हम पूरी तरह उनके हाथों में थे, तब हमें ठोस तरीका सिखाया गया कि उजड़े हुए मन और धरती-आकाश को कैसे फिर से खड़ा किया जाए।
उस समय सबसे पहले कहा गया था, “पौधे लगाओ, बढ़ाओ।”
तब बहुत कुछ सिखाया गया, लेकिन बड़ी दिशा से कहें तो “कला, विज्ञान और आध्यात्मिकता का उन्नयन और पुनरुद्धार नई सभ्यता-संस्कृति खोलने की कुंजी है” वाली बात और “मानवता का सार, एक भी अपवाद के बिना, दिव्यता है” वाली बात अब भी अच्छी तरह याद है।
हाँ, प्राकृतिक आपदाओं, धरती के मरुस्थलीकरण और असामान्य मौसम के बारे में भी कहा गया था, “इन घटनाओं पर पूरी मानवता की चेतना की स्थिति का भी असर है, इसलिए अपनी आत्मा के मूल में सुलाए गए प्रेम और कृतज्ञता के हृदय को सबसे पहले पुनर्जीवित करो।”
तुम्हें भी कुछ याद आता है?
पृथ्वी पर भी सूखी धरती कई जगह है, लेकिन यह वहाँ रहने वालों को दोष देने की बात नहीं, बल्कि पूरी मानवता के मन की नमी धरती की नमी से भी जुड़ी है।
ऐसी धरती में नमी लौटाना सिर्फ़ मानवीय बुद्धि से कठिन लग सकता है।
असल में हर व्यक्ति को “मनुष्य क्या है,” “जीवन क्या है,” “मनुष्य क्यों जन्मता, जीता और मरता है” जैसे मनुष्य के रूप में जीने के मूल प्रश्नों को पूरी तरह खोजकर असली सत्य तक पहुँचने के लिए जीना चाहिए, लेकिन रोज़ के जीवन में व्यस्त ज़्यादातर लोगों के पास इतना सोचने की फ़ुर्सत नहीं, इसलिए उस स्तर तक न पहुँचने वाले बहुत हैं।
ऐसी बातें भी असल में तब तक अर्थहीन हैं जब तक इन्हें अपनी बात मानकर मन की गहराई की जड़ तक उतारकर, अपने कर्म और अनुभव से, अपने «जीवन के प्रकाश» से आने वाले अंतर्ज्ञान के रूप में महसूस होने वाली समझ न बनें। लेकिन न सुनने, न पढ़ने वालों की तुलना में, इस गूँज से छूने वाले के लिए बाद के जागरण के समय “ओह, उस समय की वह बात यही थी” कहकर समझ गहरी करने में सहारा मिलता है, इसलिए याद रखो तो खुशी होगी।
★सत्य और मानवता के एकीकृत युग का स्वागत करने के लिए
बात पटरी से उतर गई, लेकिन विशाल-असीम महाब्रह्मांड को लपेटकर समेटने वाली, सबको जीवित रखने वाली दिव्यता की गूँज से पृथ्वी की पूरी मानवता एकाकार होकर दिव्य मानवता के रूप में पुनर्जीवित हो, इसके लिए सबके मूल में मौजूद सत्य को पकड़कर स्वयं सत्य के रूप में जीना ज़रूरी है।
इसके लिए चेतना और सत्य को एकाकार करके, उसी की गूँज को सोचने, कहने, करने की अवस्था तक स्तर ऊपर उठाना होगा।
इसे अभ्यास में लाने का तरीका है परोपकार की प्रार्थना से एकाकार गहरी साँस को हर समय की साँस बनाना।
अब किसी तर्क की ज़रूरत नहीं।
करते हो या नहीं, बस इतना ही।
तुम्हारे जीने का हर क्षण “जीत या हार” वाले परम चुनाव के क्षणों की शृंखला है।
पृथ्वी का बड़ा हिस्सा सत्य की गूँज में लिपटकर असेंशन (आयामी उत्थान) करेगा, यह तय है, लेकिन उस ऊपर उठती हवा पर सवार होने या न होने का निर्णय हर पृथ्वीवासी की चेतना पर छोड़ा गया है।
अभी से ज़्यादा सीख वाले तारे पर जीवन फिर से शुरू करना, या ऐसे ही ऊपर उठती हवा पर सवार होकर महाजीवन के मूल स्रोत की यात्रा जारी रखना, यह चुनाव हर व्यक्ति पर है। और तुम अब उस जगह हो जहाँ ऊपर उठती हवा पर सवार होने का रास्ता चुन सकते हो।
पृथ्वीवासियों में बहुत-से अब भी गलतफ़हमी में हैं, लेकिन मरने पर भी तुम मिटते नहीं।
चेतना, चाहे किसी भी रूप में, अनंत काल तक बनी रहती है।
इसलिए अहं से कितना भी छटपटाओ, स्थायी जीवन का उपयोग करने का रास्ता चेतना-विकास के सिवा कोई नहीं।
इसे किसी और की नहीं, अपनी बात मानकर अच्छी तरह सोचो।






