चेतना की खड़ी धुरी और पड़ी धुरी को जीवन के स्रोत पर काटने दो (उत्तरार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
इसी नाम का पिछला लेख
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(पिछली बार से जारी)
★अस्तित्व का अर्थ पूरा करने के लिए
इसकी कुंजी है साँस।
जैसा हमेशा कहता हूँ, मनुष्य साँस के ज़रिए जीवन के स्रोत से जुड़ा है।
जो शरीर साँस लेना बंद कर दे, उसे मृत शरीर, लाश कहते हैं, है न।
इसलिए साँस लेना, यानी जीवित होना।
लेकिन बस साँस लेते हुए जीते रहना ही काफ़ी नहीं, यह तो समझ आता है न।
केवल इतने से तो तुम जीवन द्वारा जैसे जीवित रखे गए वैसे ही जीने वाले जानवरों के स्तर के जीव बन जाओगे।
मनुष्य जीवन के प्रकाश से जीवित रखा गया अस्तित्व तो है ही, साथ ही वह सबको जीवंत करने के लिए मौजूद है।
क्योंकि सबको जीवंत करने की शक्ति हर किसी में निहित है, और उस शक्ति का पूरा उपयोग करके, अभी जिस ग्रह पर रहते हैं उसके भाग्य का सृजन करना ही मानवता के अस्तित्व का अर्थ है।
तो बात पर लौटें, रोज़ के कामकाज में लगे रहते हुए चेतना का दायरा बढ़ाना, यानी खड़ी दिशा में ऊपर चढ़ना और पड़ी दिशा में फैलना।
इसे कैसे करें, तो इसके लिए ख़ास तौर पर मनुष्य की ओर से किसी प्रयास की ज़रूरत नहीं।
“अजीब बात कह रहे हैं” ऐसा लगता है?
लेकिन फिर से कहता हूँ, मनुष्य की ओर से किसी प्रयास की ज़रूरत नहीं।

★चेतना की खड़ी धुरी और पड़ी धुरी को गहराई में काटने देने का तरीका
तो क्या करें, तो साँस को गहरा करना, धीमा और सहज करना, बस इतना ही काफ़ी है।
प्रयास की ज़रूरत नहीं, इसका अर्थ है कि दिमाग़ में तरह-तरह की बातें सोचने की ज़रूरत नहीं; बिना कोई फ़ालतू बात सोचे, बस साँस को गहरा बनाए रखने में ही मन लगाए रहो, तो चेतना अपने आप गहरी होती और फैलती जाती है।
गहरी साँस जारी रखो, तो उदाहरण के लिए, अब तक जिसके बारे में समझ नहीं आता था कि वह ऐसा क्यों करता है, उसके बारे में समझ आने लगता है कि वह ऐसा व्यवहार क्यों करता है, या अब तक जिन बातों का ख़याल तक नहीं आता था, वे भी बोध की सीमा में आने लगती हैं, और सोचने का दायरा फैलता जाता है।
ऐसा करते-करते पता चले बिना, चेतना की खड़ी धुरी पर चढ़ते हुए, चेतना की पड़ी धुरी भी फैलने लगती है।
सरल है न।
चेतना का विकास सुनते ही कुछ लोग सतर्क होकर सोचते हैं कि कुछ विशेष करना होगा, लेकिन समझ आया कि इसका उससे कोई संबंध ही नहीं।
असेंशन कहो या आयामी उत्थान, आत्मा को निखारना कहो या चेतना का विकास, सब कुछ इस बारे में है कि अब तक जो था उसे “NO” कहकर नकारो, और फिर से “A” से शुरू करो।
यही NOA, यानी नूह का सिद्धांत भी है।
तुम लोग करो तो कर सकने वाले लोग हो, इसलिए ऐसी बात करता हूँ, लेकिन बहुत से लोगों के लिए अभी थोड़ा समय लग सकता है।
क्योंकि अहं के विचार अभी भी प्रबल रूप से काम कर रहे हैं।
तुम लोगों में से बहुतों को खुद पता नहीं, लेकिन पिछले जन्मों में तुम काफ़ी महान संत या बड़े व्यक्तित्व रह चुके हो।
इसलिए अभी जो करने जा रहे हो, वह पहली बार करने वाली बात नहीं, बल्कि कभी चले हुए रास्ते पर फिर से चलने जैसी बात भी है।
पृथ्वी के इतिहास तक सीमित न रखकर देखो, तो तुमने ऐसे अनुभव कई बार जोड़े हैं।
आत्मा की उस जमा हुई क्षमता को बस प्रकट कर दो, तो चेतना की खड़ी और पड़ी धुरी के कटने का बिंदु तेज़ी से ऊँचा और गहरा होता जाता है।
यह समझ आ गया, तो करके देखो।
तुम लोग ज़रूर कर सकते हो।
क्योंकि तुम्हारे पास उतनी क्षमता है। (समाप्त)






