परिष्कृत बुद्धिमान जीव में विकसित होने के लिए
प्रकाशित अद्यतन
“मनुष्य किसलिए जी रहा है?”
ऐसे दार्शनिक प्रश्न से टकरा सकने वाला व्यक्ति, पिछले जन्म, उससे भी पिछले जन्म, यानी पिछले जन्मों के पिछले जन्मों के पिछले जन्मों से, सत्य को बार-बार खोजता आया व्यक्ति है।
ऐसा व्यक्ति न हो, तो जीते जी ऐसा सोचता भी नहीं।
आड़े फैले धरती के संसार पर नज़र डालो।
बहुत से लोग भावनाओं की संतुष्टि के लिए जी रहे हैं, है न।
बहुत से लोग रोज़ की व्यस्तता में आदतन विचारों में बहकर जी रहे हैं, है न।
मनुष्य, हाँ, मूल रूप से परिष्कृत बुद्धिमान जीव में विकसित होने के लिए जी रहा है।
“परिष्कृत बुद्धिमान जीव” की अवस्था का अर्थ है, भावनात्मक विचारों को नियंत्रित कर सकने वाली चेतना-अवस्था।
मनुष्य सच में सब, उस चरण में प्रवेश करने का लक्ष्य लेकर जी रहे हैं।
लेकिन उस चरण में कदम रखने तक, अनगिनत पुनर्जन्म ज़रूरी हैं, और इस जीवन में उसमें रुचि ले सके तुम, हर तरह के अनुभव जोड़ती आई पुरानी, पुरानी, बहुत पुरानी आत्मा हो।
इसके प्रति सजग हो जाओ, तो तुम्हारे भीतर शुरू से बसी उच्च देवताओं की चेतना का स्पंदन प्रकट होता है, और पता ही नहीं चलता कब, भावनाओं के वश वाले संसार से बहुत दूर जाकर, सबको ऊपर से देखने वाली आँख वाली पवित्र चेतना फिर से जाग उठती है।

अब तक कई बार कहा है, वहाँ तक पहुँचने की कुंजी है “धीमी और आरामदायक साँस”।
साँस धीमी करो, तो चेतना का केंद्र पेट के निचले हिस्से में उतर आता है।
पेट के निचले हिस्से में चेतना मज़बूती से उतर आए, तो चेतना आत्मिकता और दिव्यता के स्पंदन-क्षेत्र में प्रवेश करती जाती है।
पृथ्वी सच में नए संसार में प्रवेश करने जा रही है, इस समय हम चाहते हैं कि तुम लोग हमें अपना “सच्चे मन का कर्म” दिखाओ।
सत्य, शिव और सुंदर, प्रेम, सत्य, पवित्रता……, ऐसी परिष्कृत चेतना की गूँज को अपने में समाकर हर क्षण जीने वाला, सच्चे मन के कर्म में दिन जी रहा है।
तरीके उतने हैं जितने लोग।
“ऐसा ही होना चाहिए” जैसा कोई बंधन नहीं है।
कुछ लोगों को लग सकता है कि दूसरों ने उन पर ऐसा कोई बंधन डाल रखा है।
लेकिन ऐसे बंधन, सब अपने ही द्वारा अपने पर डाली गई अपनी ही रस्सी हैं।
यह समझ में आ जाए, तो विचारों की रस्सी को सर-सर करके खोल दोगे, और स्वतंत्र चेतना के महासागर में जीने वाले व्यक्ति बन सकोगे।







