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तारों के साथ संवाद के युग का द्वार खोलने के लिए

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

Voice of Space Brothers

सच्ची शक्ति (पूर्वार्ध)

प्रकाशित अद्यतन

★द्वैत के टकराव की दुनिया में ठहरा हुआ व्यक्ति

जो व्यक्ति मुँह खोलते ही दूसरों की आलोचना, निंदा और मनमाने मूल्यांकन में लगा रहता है, उसे द्वैत के टकराव वाली ऊँच-नीच की होड़ में मूल्य देखने वाला व्यक्ति कहा जा सकता है।

ऐसे व्यक्ति के लिए मनुष्यों के बीच “जिसकी लाठी उसकी भैंस” वाली जीवन-प्रतियोगिता में जीतना ही सफलता है, और जो उसमें सफल हुआ वही जीवन का विजेता है, ऐसा वह सचमुच मान बैठा है।

ऐसे समय का मन “मैं ही सही हूँ, मज़बूत हूँ, न्यायसंगत हूँ” जैसी धारणाओं से अनजाने ही दूसरों से ऊपर खड़े होने की कोशिश करने वाले चरण में ठहरा रहता है।

और जिसने खुद को उस होड़ में हारा हुआ मान लिया, वह अपनी खीझ और कमज़ोर को दबाकर मिटाने की कोशिश करता है।

ऐसी दुनिया में समाज के कमज़ोर लोग हर युग में स्त्रियाँ, बच्चे और बुज़ुर्ग रहे हैं।

ऐसी “जिसकी लाठी उसकी भैंस” वाली जीवन-प्रतियोगिता में मूल्य देखकर जीने की मानसिक स्थिति में अभी दिव्यता सोई हुई है।

पृथ्वी से कम नाता रखने वाले दूसरे तारों के कुछ लोगों को पृथ्वी की यह हालत अभी विकास के बीच में खड़े एक युवा तारे जैसी भी दिखती है।

★जहाँ दिव्यता है वहाँ कोई शत्रु नहीं

पर हम जानते हैं कि तुम लोगों का सार हमारी ही तरह दिव्यता में है।

जिसने वह दिव्यता प्रकट कर ली है, वह व्यक्ति अपने और दूसरे में ऊँच-नीच लगाकर, खुद को ऊपर रखकर, दूसरों को घुटनों के नीचे दबाने जैसी बात कभी नहीं सोचता।

मूल रूप से, ऐसा कुछ करने का विचार ही उसमें नहीं होता।

यहाँ जिसे “दिव्यता प्रकट कर चुका व्यक्ति” कहा गया है, वह मज़बूत और उत्तम मन वाला व्यक्ति है, और ऐसे व्यक्ति का कोई शत्रु नहीं, यानी वह अजेय है।

उस अजेय मानसिक स्थिति वाले व्यक्ति को “दिव्यता को अभिव्यक्त करने वाला व्यक्ति” कहते हैं।

इसलिए दिव्यता को प्रकट करके जीने वाला व्यक्ति ही सच्चा बलवान कहला सकता है।

★जितना बलवान, जितना उत्तम, उतना ही

मनुष्य जितना बलवान होता है, जितना उत्तम होता है, मूल रूप से उतना ही, “फल से लदी बाली सिर झुकाती है” इस कहावत की तरह, खुद को नीचे के आसन पर रखकर, दूसरों को आगे करके, संयम से व्यवहार करता है।

तभी वह असली मनुष्य, सच्चा मनुष्य है।

आज की दुनिया में तेज़ी से दिव्यता को याद कर चुके असली मनुष्य प्रकट होने लगे हैं, फिर भी इस दुनिया में अभी भी ऐसे लोग बहुत हैं जिनकी दिव्यता सोई हुई है।

मनुष्य और दूसरे जानवरों के बीच सबसे बड़ा, मूलभूत अंतर विवेक का होना या न होना है।

वह विवेक दिव्यता भी कहा जा सकता है, इसलिए उसकी जड़ में सब वस्तुओं की रक्षा करने, पालने और जीवन देने की करुणा बसी हुई है।

तो जो व्यक्ति मन में विवेक बनाए रखकर जीने की स्थिति में है, उसका मन पानी जैसे स्वभाव वाला भी कहा जा सकता है।

ऐसे व्यक्ति के विचार ऊँचाई से नीचे की ओर बहते हैं, त्रिकोण पात्र में डालो तो त्रिकोण, गोल पात्र में डालो तो गोल हो जाते हैं; इस तरह व्यक्तिगत स्व नामक बाधा न होने से, वह परिस्थिति के अनुसार स्वच्छंद रूप से अपने को बदलकर पृथ्वी की हर जगह से सामंजस्य बिठा सकता है, यही बात है।

मनुष्य को, चाहे खुद को कितना भी सही लगे, झुकने के समय अपने को झुका सकने वाली लचीली सोच रखना वांछनीय है।

क्योंकि ऐसा न हो, तो घायल और भटकी हुई मानवता के मन में जीवन का मूल प्रकाश बहाकर, मूल विवेकपूर्ण दृष्टि लौटाने में मदद करना कठिन है।

★जो सच्ची शक्ति रखनी चाहिए

ऐसा बने रहने के लिए मनुष्य को बलवान होना ही चाहिए।

वह जो सच्ची शक्ति उसके पास होनी चाहिए, अभी कहा जैसा, बाहुबल या सैन्यबल या दूसरों को हरा देने वाली वाक्पटुता जैसी चीज़ नहीं है।

यहाँ शक्ति का अर्थ है सच्ची मानवीयता में जड़ें रखने वाला करुणामय हृदय होना, और उस हृदय पर आधारित विवेक पर खड़े होकर सब बातों को भली-भाँति सँभालने की शक्ति।

वही चेतना अजेय मन है, और दिव्यता की स्थिति है।

दोहराता हूँ, अजेय का अर्थ किसी से भी लड़ो तो न हारने वाली ताक़त नहीं है।

यह उस सच्ची मानवीय शक्ति की बात है जो सब कुछ को समेट लेती है और उसे हथेली पर रखकर देख सकती है, जीत-हार से परे। (अगली बार जारी)

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

Angelusbell

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वीडियो एक-एक करके जारी किए जाएँगे।

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