ऐसे स्पंदन-क्षेत्र में जीने की युक्ति जहाँ छल नहीं चलता
प्रकाशित अद्यतन

★ऐसी दुनिया में जहाँ छिपाना और छल नहीं चलता
अब तक “ऐसी दुनिया बनेगी जहाँ छिपाना और छल नहीं चलता,” यह बहुत बार बताया है न?
पृथ्वी-संसार में ठीक वैसे ही, अब तक अंधकार में छिपकर कुलबुलाते सार्वभौमिक सत्य से दूर के विचार, वचन और कर्म (लोगों के विचार-वचन-कर्म जो उजागर नहीं होते थे) अत्यंत स्पष्ट रूप से लोगों की नज़र में आने लगे हैं।
यही आत्मिकीकरण के आगे बढ़ने का प्रमाण है।
देखते रहो।
यह प्रवृत्ति आगे और स्पष्ट होती जाएगी।
और ऐसी दुनिया बनेगी जहाँ झूठ और छिपाना बिल्कुल नहीं चलेगा।
तो झूठ, छिपाने और छल आदि में, कुछ ऐसे हैं जो किसी को भी देखते ही समझ आ जाते हैं, और कुछ ऐसे जिनका स्वयं व्यक्ति को भी एहसास नहीं।
आगे की दुनिया में, मन की तहों की गहराई में चिपके, सतह पर न आए झूठ, छिपाना और छल आदि भी सतह पर आएँगे।
सरल शब्दों में, वे विचार, वचन और कर्म भी नहीं चलेंगे जिनके असत्य होने का बोध तक नहीं था।
ऐसे आत्मिकीकृत संसार में, उन्हें ज़बरदस्ती सही ठहराने की कोशिश हर किसी की नज़र में कष्टदायी रूप में दिखती है, इसलिए “दूसरों का आचरण देखकर अपना आचरण सुधारो” पर सबके लिए अमल करना आसान हो जाता है।
राजनीति की दुनिया की समस्याएँ अच्छा उदाहरण हैं न?
आगे की दुनिया में “पकड़े न जाएँ तो कुछ भी करो” वाली सोच नहीं चलेगी, इसलिए ऐसे विचार, वचन और कर्म जल्दी उतार फेंको, तो जीना कहीं आसान हो जाएगा।

★आत्मिकीकृत संसार में आसानी से जीने की जीवन-शैली
और आगे की दुनिया में, गहरी साँस के साथ किया गया सच्चा आत्म-चिंतन ही अपनी जीवन-शैली को सार्वभौमिक सत्य के अनुरूप ले जाने वाली सबसे बड़ी सहायता बनता है।
अपने मन और वचन-कर्म-व्यवहार को ईमानदारी से देखकर, ज़रा भी धुँधलापन न रखने वाला व्यक्ति बन सको, इसके लिए खुद अपना मार्गदर्शन करो।
यह दूसरों से माँगना गलत है, इसलिए ठान लो और चेतना का केंचुल उतारो।
सार्वभौमिक सत्य से भटकी सारी विचार-आदतों को मिट जाने योग्य मानकर, उनके पीछे निहित दिव्यता को सक्रिय रूप से बाहर निकालकर विचार, वचन और कर्म करते जाओ, तो वह व्यक्ति आत्मिकीकरण के साथ जीने की कठिनाई महसूस किए बिना स्वस्थ और उज्ज्वल भविष्य रच सकता है।
अवश्य।
आत्मिकीकृत संसार में आसानी से जीने की जीवन-शैली, पहले और दूसरे दोनों नंबर पर, दिव्यता पर आधारित विचार, वचन और कर्म का ध्यान रखकर व्यक्त करने वाली जीवन-शैली है।
छल भी छिपाना भी अब बंद करो।
ईमानदारी से खुद को देखो, और जब समझ आए कि तुम बस इतने हो, तो उसे सहज रूप से व्यक्त करो।
इसमें ज़रा भी शर्म की बात नहीं।
आत्मिकीकृत संसार में शक्तिशाली होने का दिखावा करो, तो भी कभी न कभी पता चल ही जाता है।
तो फिर, जैसे हो वैसे खुद को प्रकट करते हुए, मन के भीतर चेतना के विकास की ओर उन्मुख होकर लगन से चेतना-सुधार में लगना ही, लंबा रास्ता लगते हुए भी चेतना के विकास का सबसे छोटा मार्ग है।
इसके लिए बुनियादी धारणा ही है, जो मैं हमेशा कहता हूँ, [दिव्यता और भौतिकता के विचार, वचन और कर्म में अंतर]।
और ऐसा कर पाने के लिए, निरंतर साँस को आरामदेह बनाए रखना प्रभावी है।
रोज़मर्रा की अचेतन साँस शरीर से चिपके आदतन विचारों को बहाते रहने की अवस्था की साँस है, इसलिए विचारों को जड़ता से न बहाकर सचेत रूप से छोड़ पाने योग्य बनाने वाली आरामदेह साँस का महत्व आगे और अधिक स्वीकार किया जाएगा।
तुम्हारा अस्तित्व, आगे इस मार्ग से आने वाले लोगों के लिए जीवित शब्दकोश होने के साथ-साथ जीवित मार्ग-चिह्न बनेगा।
इसे पूरी तरह समझकर इस मार्ग पर एक-एक कदम बढ़ो, ऐसी मेरी चाह है।







