सहानुभूति की शक्ति और बोध का सेंसर
प्रकाशित अद्यतन
किसी की बात सुनकर तरह-तरह की राय बनती है न।
“अच्छी बात थी”
“उबाऊ बात थी”
“यह व्यक्ति केवल ज्ञान के बल पर बोल रहा है”
“यह व्यक्ति असली है, नकली है”
“थोड़ी दिल को छूने वाली बात थी” ऐसे।
लेकिन, वहाँ थोड़ा पीछे मुड़कर सोचो।
दूसरे की बात सुनकर, “पर वह तो उस व्यक्ति की सोच और अनुभव भर है, मुझसे उसका कोई संबंध नहीं” ऐसा अनजाने में सोचकर, हमेशा उसे अपने जीवन में कर्म में प्रकट न करो, तो मिली हुई सीख बर्बाद होती है न।

महत्वपूर्ण है, अच्छी बात सुनो तो, उसे अपने जीवन में कर्म में प्रकट करने का अभ्यास करके, उसे अपना बना लेना।
जीवन का सत्य और ज्ञान, केवल अपने अंतर्ज्ञान में ही प्रकट हो, ऐसा नहीं।
सत्य और ज्ञान, दूसरों की बातों से तो, और क़रीबी लोगों से सहज बातचीत, अचानक देखी टीवी की कहानी, पढ़ी किताब के लेख, और प्रकृति के संपर्क से भी पाया जा सकता है।
इस अर्थ में, सब कुछ शिक्षक है, दर्पण है।
तुम्हारे बोध का सेंसर जितना उच्च क्षमता वाला होगा, उतना ही सब कुछ अपने आप को निखारकर ऊँचा उठाने की सामग्री बनता है।
और, अगर तुम खुले और निष्पक्ष मन से जीते हो, और सब कुछ में सीख खोजने वाली चेतना रखते हो, तो जीवन बोधों के ख़ज़ाने के संदूक में बदल जाता है।
ऐसा हो जाए तो हर दिन बोधों का सिलसिला होगा।
तब तुम, आज भी मिलने वाले नए बोधों से मुलाक़ात की उमंग में, हर क्षण रोमांच और धड़कन के साथ जी सकोगे।






