गरिमा की गूँज भेजें
प्रकाशित अद्यतन
★सच्ची गरिमा क्या है
तुम लोग किसी को देखकर कहते हो कि उस व्यक्ति में गरिमा है या नहीं, पर जब कोई पूछे, “सच्ची गरिमा क्या है?” तब “यह ऐसी-ऐसी है” कहकर उत्तर दे सकने जितनी पहचान रखते हो?
सच्ची गरिमा दिव्यता की गूँज निकलने की स्थिति को कहते हैं।
चाहे कितना भी परिष्कृत रंग-ढंग हो, कितनी भी शिष्ट भाषा हो, कितनी भी सुरुचिपूर्ण वेशभूषा हो, केवल इतने से गरिमा है, यह नहीं कहा जा सकता।
सच्ची गरिमा दिव्य चरित्र से मेल खाने वाली चीज़ है, इसलिए सतह पर चाहे कितना भी सजाओ, बस गरिमामय दिखती है, और आत्मा के स्तर के प्रकट होने की स्थिति नहीं कही जा सकती।
अगर तुम गरिमा अपने में साधना चाहते हो, तो मन को माँजकर चेतना के विकास का लक्ष्य रखो।
क्योंकि चेतना के विकास की प्रक्रिया में मनुष्य का भौतिक चरित्र और सूक्ष्म चरित्र आत्मिक चरित्र, दिव्य चरित्र की ओर चरण-दर-चरण बढ़ता है, और एक दिन सच्ची गरिमा अपने में साधना संभव होता जाता है।

★गरिमा को माँजकर निकालने का तरीक़ा
इसके लिए स्नेह के हृदय से सब कुछ को समेटकर देखना और उस हृदय को विचार, शब्द और कर्म में प्रकट करना महत्वपूर्ण है।
इसके लिए आसान तरीक़ा है गहरी साँस को हर समय की चीज़ बनाकर, हमेशा समष्टि के सामंजस्य की प्रार्थना करते हुए समय बिताना।
इसे जारी रखो, तो अनजाने में हायर सेल्फ़ का मन सतह पर आने लगता है, और न जाने कब कोई भी व्यक्ति गरिमा वाला व्यक्ति बन सकता है।
जब चेतना सामान्य स्तर की हो, तब मनुष्य केवल अपनी और निकट के लोगों की खुशी ही सोचता है, इसलिए हितों के टकराव वाले व्यक्ति या संगठन की खुशी नहीं सोच पाता।
पर इस दुनिया में हितों के टकराव वाला व्यक्ति भी, कोई नाता-रिश्ता न लगने वाला व्यक्ति भी, सब-के-सब सार में दिव्य हैं, एक भी अपवाद के बिना, सब मूल रूप से दिव्य मानवता हैं।
इसे स्वाभाविक रूप से याद दिला देना तुम लोगों का मूलभूत काम है, और इसके लिए प्रार्थनामय हृदय को हमेशा आधार में रखकर सारे विचार, वचन और कर्म करना, इस तरह सचेत रूप से जीवन का इस्तेमाल करना महत्वपूर्ण है।
क्योंकि सतह का वर्तमान चाहे कितना भी अस्त-व्यस्त लगे, पृथ्वी की भोर अब बस वहीं तक आ चुकी है।






