गहरी श्वास जो सिखाती है
प्रकाशित अद्यतन
सुबह जागने के क्षण लेटी हुई अवस्था में
मन के भीतर धीरे-धीरे
पवित्रता की वाक् बोलते हुए
सिकोड़े हुए होंठों से ज़ोर से
जितना हो सके लंबा साँस बाहर छोड़ते जाओ
छोड़ते, छोड़ते, पूरा छोड़कर
फिर भी साँस बाहर छोड़ते जाओ
“अब और नहीं निकलती” लगने पर
निचोड़ने की तरह साँस पूरी छोड़ दो
ऐसा करने पर
जैसे रुई में पानी समाता है
वैसे ऑक्सीजन फेफड़ों में भर आती है
फिर शरीर उठाकर
घुटनों के बल बैठकर या कुर्सी पर बैठकर
वही प्रक्रिया दोहराओ
फिर खड़े होकर वही दोहराओ
इस तरह कुछ बार दोहराते-दोहराते
20 सेकंड, 30 सेकंड, 1 मिनट, डेढ़ मिनट
साँस लेने की मात्रा बढ़ती है
और और, और और
छोड़ी जाने वाली साँस की मात्रा बढ़ती जाती है
अंततः जब सचमुच छोड़ने को साँस न रहे
जैसे गड्ढे में पानी तेज़ी से बह आता है
वैसे ऑक्सीजन फेफड़ों में एक साथ बह आती है
और ताज़े जीवन-तत्व शरीर में भर गए हैं, यह महसूस होता है
इस तरह दिन शुरू करो तो
परिपूर्ण मन और शरीर के साथ
उज्ज्वल दिन बिताया जा सकता है
जागते हुए भी कुछ बार
यह “साँस को पूरा बाहर छोड़ना” करो तो
मन और शरीर में चयापचय की शक्ति बढ़कर
पवित्रता की चेतना बनाए रखना आसान हो जाता है

हम श्वास से लोगों से जुड़े हैं
हवा, पानी और धरती से जुड़े हैं
पौधों और पशुओं से जुड़े हैं
नहीं, इतना ही नहीं
तारों और ब्रह्मांड से जुड़ाव भी
गहरी श्वास से ही बनता है
रोज़ की धीमी, शांत श्वास
हमें एकत्व का सार
चुपचाप सिखा रही थी

