अपने आप पर निर्भर
प्रकाशित अद्यतन
◎मन के अनुसार नहीं जी सकते, तब भी जैसा सोचा वैसा ही हो रहा है।
◎असंतोष और शिकायत महसूस होने वाला जीवन भी, केवल खुशी वाला जीवन भी, सब हर एक का रचा हुआ, सोचे अनुसार वाला जीवन है।
◎विचारधारा को शक्ति मत दो। ऐसे लोग, सामने वाले की मानी हुई विचारधारा को अपनी विचारधारा से मापकर, शत्रु और मित्र में भेद करते हैं।
◎सत्य की आँख से देखें तो न शत्रु है न मित्र, पूरी मानवता जीवन के भाई-बहन है।

◎स्वयं और दूसरों को बाँटने वाली विचार-आदत, चेतना पर सोच और पवित्रता के आपस में घुल-मिल जाने की अवस्था कही जा सकती है।
◎सोच और पवित्रता दिखने में एक जैसी पर अलग चीज़ें हैं, इस तथ्य को स्पष्ट, ऊपर से देखने वाली आँख से देखने के लिए, “जिसे मैं ‘मैं’ मानता था वह ‘मैं’ (भौतिक शरीर से चिपकी सोच), सच्चा ‘मैं’ नहीं था” ऐसा आश्चर्य से भरकर सोचते रहना अच्छा है।
◎पूरी मानवता पवित्र अस्तित्व है। इसके अलावा कोई सत्य ब्रह्मांड में कहीं मौजूद नहीं।
◎हर व्यक्ति में पवित्रता में जड़ें जमाए अद्भुत गुण निहित हैं। उन्हें बढ़ाना या छिपाए रखना, अपने आप पर निर्भर है।




