खारे-मीठे पानी के संगम के युग की स्थिति और जीवन-ढंग (पूर्वार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
★खारे-मीठे पानी के संगम में परासरण-दाब का समायोजन और आज का स्पंदन-समायोजन
सामन जैसी कुछ मछलियाँ मीठे पानी में भी और समुद्री पानी में भी, दोनों जल-क्षेत्रों में जी सकती हैं, है न।
पृथ्वी का आत्मिकीकरण आगे बढ़ चुके आज के युग में, उन प्रवासी मछलियों की तरह तुम पृथ्वी की मानवता के लिए भी, दिव्य स्पंदन की दुनिया में भी और भौतिक स्पंदन की दुनिया में भी, दोनों स्पंदन-लोकों में जी सकने वाले मन-शरीर तक अपने को माँजना महत्वपूर्ण है।
समुद्र में भी और नदियों में भी जी सकने वाली सामन जैसी मछलियाँ दोनों जल-क्षेत्रों में क्यों जी सकती हैं, तो इसलिए कि मूल रूप से सब समुद्र में पैदा हुई थीं, पर गतिविधि का दायरा फैलाने के नतीजे के रूप में उन्होंने नदियों के अनुकूल होने का स्वभाव पा लिया।
और उनमें से कुछ मछलियाँ मीठे पानी की आदी होकर समुद्र में लौट नहीं पाईं।
यहाँ तक कहने पर आज की बात का सार समझ में आया?
मीठे पानी की मछलियों से माफ़ी चाहता हूँ, पर भौतिक स्पंदन की आदी होकर दिव्य स्पंदन वाले अपने मूल स्वरूप को भूल चुकी पृथ्वी की मानवता उस मीठे पानी की मछली जैसी है जो मूल रूप से समुद्र में पैदा हुई और पली थी, पर अपने घर के अनुकूल नहीं रह पाई।
पृथ्वी पर रहने वालों में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं जिसका मूल स्वरूप दिव्य स्पंदन की दुनिया में न हो, फिर भी बहुत से लोग सोचते हैं कि ऐसी कोई दुनिया नहीं, या उसके अस्तित्व में विश्वास करते हुए भी, अपने विचारों और कर्मों की सफ़ाई तक अभी उनका ध्यान नहीं गया है।
पृथ्वी आज की तरह सामंजस्य खोई हुई स्थिति में इसलिए है कि सत्य को भूली हुई पृथ्वी की पूरी मानवता के विचार, शब्द और कर्म जमा होते गए हैं, है न।
पृथ्वी को सामंजस्यपूर्ण तारा बनाने के लिए उस मानवता को खुद सत्य के अनुरूप विचार, वचन और कर्म याद करके उनका अभ्यास करना होगा, और प्रकृति की स्थिति और सब जीवों के पारिस्थितिकी-तंत्र को मूल रूप में लौटाने का प्रयास भी करना होगा, है न।

क्या? ऐसा क्यों करना पड़ेगा?
हा हा हा हा।
बचपन याद करो।
अपने निकाले खिलौने खुद न समेटो तो क्या माता-पिता नहीं डाँटते थे?
अपना कमरा खुद समेटना और व्यवस्थित रखना, बहुत अमीर घरों को छोड़कर जहाँ नौकर रखे जाते हैं, सबने सहज रूप से किया है, है न।
थोड़ी अशिष्ट बात करें, तो शौचालय जाकर बड़ा काम निपटाओ, तो अपना पिछवाड़ा खुद ही पोंछते हो, है न।
हम जो कह रहे हैं वह कुछ भी विशेष नहीं, मनुष्य के लिए सहज बातें ही हैं।
तो पृथ्वी-जगत में मानवता को खुद करने वाली सफ़ाई का अर्थ, यों भी कहा जा सकता है कि पिछले जन्मों समेत अपने निकाले विचारों और कर्मों की पूरी ज़िम्मेदारी लेना, और यों भी कि चेतना को शुद्ध रखकर उज्ज्वल भविष्य रचने वाला वर्तमान जीना।
यही, दूसरे कोण से देखें तो, भौतिक स्पंदन की दुनिया में दिव्य स्पंदन की दुनिया को प्रतिबिंबित करने वाला स्पंदन-समायोजन बन रहा है, और पृथ्वी के आयाम को उच्च आवृत्ति की गूँज तक ऊपर उठाने के पहलू से देखें तो, घुमावदार दिखते हुए भी सबसे छोटा रास्ता भी है। (अगली बार जारी)






