दिव्यता के पुनर्जागरण की लहर को क्रांतिक द्रव्यमान बिंदु तक ले चलें (उत्तरार्ध)
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(पिछली बार से जारी)
★पृथ्वी की मानवता की चेतना को जगाने के लिए तुम लोग जन्मे हो
वहाँ तक पहुँचाने के लिए भी, दिव्यता के पुनर्जागरण की लहर को क्रांतिक द्रव्यमान बिंदु तक ऊपर उठाना ज़रूरी है।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि यही करने के लिए, तुम लोगों ने इस जीवन को चुनकर जन्म लिया है।
उसका तरीका, जैसा अब तक बताते आए हैं, अपने जीवन में दिव्यता में जड़ें जमाए विचार, वचन और कर्म को सहज भाव से प्रकट करते हुए जीना है।
मन को तनाव में रखकर, बड़ी-बड़ी मुद्रा बनाकर, “कुछ ख़ास करना होगा” या “कोई कदम उठाना होगा” ऐसा सोचने की ज़रूरत नहीं है।
पक्ष या विपक्ष वाले सामाजिक आंदोलन दूसरों पर छोड़ देना ठीक है, और अपनी सोच मनवाने के लिए दूसरों को झुकाने के बारे में सोचने की ज़रूरत नहीं।
ऐसे तरीके में, न चाहते हुए भी द्वैत के टकराव वाली धारणा की गूँज आसानी से आ जाती है।
हम संसार को और भी जड़ से बदलने वाले मार्ग पर चल रहे हैं।
तुम लोग जो कर रहे हो (= जो हम सहयोग करके कर रहे हैं), वह पृथ्वी-संसार के स्वरूप को जड़ से नया जन्म देने वाला ब्रह्मांडीय महान कार्य है।
इस परियोजना में वे लोग शामिल हैं जो उस तर्क को समझते हैं, और जिनका अभी संबंध नहीं बना है, वे अभी वैसे ही रहें तो ठीक है।
क्योंकि उन्हें इसमें कोई अर्थ नहीं दिखता इसलिए रुचि लेने का कोई कारण नहीं, और तुम लोगों और हमारा साझा कार्य बेहद आध्यात्मिक है, उनके लिए हानिकारक नहीं, इसलिए उसके ख़िलाफ़ दाँत दिखाने का भी कोई कारण नहीं।
इस संसार में मौजूद हर तरह के पक्ष-विपक्ष के मतों को, और किसी भी पक्ष में न जाना चाहने वालों को भी शामिल करते हुए, सब कुछ को गले लगाकर स्वीकार करो।
फिर भी तुम लोगों की हथेली से दूर चले जाने वालों के लिए भी, उनकी चेतना-अवस्था के अनुकूल तारे पर, फिर से यात्रा जारी रखने का मार्ग तैयार है।
लेकिन ब्रह्मांड का हृदय चाहता है कि हो सके तो पृथ्वी के सभी लोग चेतना का विकास करें।

लेकिन कैसी जीवन-शैली चुननी है, यह पृथ्वी के लोगों पर छोड़ा गया है, इसलिए उस दिशा को ज़बरदस्ती थोपा नहीं जाता।
ब्रह्मांड बेहिसाब विशाल है।
केवल स्थान के रूप में विशालता ही नहीं, बल्कि मन के क्षेत्र की असीम, बाधारहित अवस्था को भी शामिल करके।
इस महान ब्रह्मांड में, वहाँ मौजूद सभी अस्तित्वों की स्वतंत्र इच्छा स्वीकार की गई है, फिर भी लंबी दृष्टि से देखें तो वे सब एक सूत्र में बँधकर सामंजस्य में आते हैं, और और भी महान विकास और सृजन की ओर बढ़ने वाली आकाश और धरती की अद्भुत व्यवस्था की गोद में हैं।
तुम लोगों का अस्तित्व भी, अपनी इच्छा से अभी वहाँ जी रहे होने की चेतना रखते हुए भी, पृथ्वी-लोक को ब्रह्मांड के हृदय के खींचे गए आदर्श संसार के क़रीब लाने के लिए भेजे गए देवदूत होने का पहलू भी रखता है।
हालाँकि इस पर ध्यान दिए बिना, कुछ लोग मानते हैं कि वे केवल अपनी इच्छा से चल रहे हैं।
अभी जो लोग शांति में बाधा डालने वाली शक्तियों में हैं, वे भी कब जीवन के मूल उद्देश्य को याद करके, ब्रह्मांड के विकास और सृजन के लिए काम करने लगें, कोई नहीं जानता, इसलिए सभी लोगों के भीतर दिव्यता के अस्तित्व को स्वीकार करके, उसे स्वाभाविक मान सकने वाली मनःस्थिति तक, अपने मन को निखारकर ऊँचा उठाओ।
यही जड़ से महत्वपूर्ण बात है।
और यही, सीधे-सीधे पृथ्वी की मानवता के मन में दिव्यता के पुनर्जागरण की लहर बनाकर, चेतना के विकास की ओर उन्मुख लोगों की संख्या को क्रांतिक द्रव्यमान बिंदु के क़रीब ले जाने का सबसे छोटा रास्ता है।
इसलिए मन के दर्पण में, स्वयं सहित मानवता की दिव्यता को रोज़ प्रतिबिंबित करके, उस पहचान को गहरा करते रहो।
ऐसा करने पर, पृथ्वी के भौतिक और मानसिक दोनों पक्षों के स्पंदन का आत्मिकीकरण और गहरा होगा, और दूसरे तारों में उपयोग होने वाले महान सामंजस्य के विज्ञान को पृथ्वी पर लाना आसान हो जाएगा। (समाप्त)






