बुद्धि का आयामी उत्थान (2)
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(पिछली बार से जारी)
★पृथ्वी-जगत का तत्काल कार्य ~ मानवता की चेतना का आयामी उत्थान
उच्च बुद्धि वाला व्यक्ति वह है जो बोध-शक्ति और अभिव्यक्ति-शक्ति कहे गए, यानी भीतर लेने की शक्ति और बाहर प्रकट करने की शक्ति, इन दोनों क्षमताओं का पूरा उपयोग कर सकता है।
और बुद्धि नाम की क्षमता का कुशलता से उपयोग करने वाले लोगों को ध्यान से देखो, तो उनके आधार बने स्थायी विचारों में आयाम का अंतर है।
इससे समझ आता है कि केवल ऊपरी बुद्धि ऊँची हो तो सब ठीक, ऐसा नहीं, है न।
IQ ऊँचा है या नीचा, यह तो बस एकतरफ़ा माप है।
जिनकी चेतना सूक्ष्म लोक के आयाम या भौतिक आयाम से चिपकी है, उनकी स्वाभाविक मान्यताएँ सार्वभौमिक सत्य से भटकी होती हैं, इसलिए उनकी बुद्धि आसानी से कुटिलता या अविवेक की ओर झुकती है, और ऐसे लोग अपनी बुद्धि का ग़लत उपयोग करके, संसार को सब जीवित प्राणियों और प्रकृति के सुख-चैन और मानव समाज के सामंजस्य में बाधा डालने की दिशा में ले जाने का रुझान रखते हैं।
ऐसा होने से परेशानी केवल मानवता को ही नहीं होती।
पृथ्वी पर रहने वाले सब जीव और प्रकृति भी, सब मानवता के आचरण से परेशान हैं।
इसीलिए कहता हूँ कि मानवता की बुद्धि हमेशा दिव्यता में जड़ जमाए, महान सामंजस्य की ओर उन्मुख कार्य हो, यही वांछनीय है।
वहाँ तक न भी पहुँचे, तो कम से कम पृथ्वी की मानवता की चेतना को आत्मिक लोक के मध्य स्तर या उससे ऊपर स्थायी रूप से बसा सको, तो लोग अपनी-अपनी विशेषता को जीवंत करके सहयोग करने से, पूरे संसार के सामंजस्य में क्रांतिकारी योगदान कर सकेंगे।
अब तक के युग में, उच्च बुद्धि वाले लोगों के लिए भी दिव्यता में जड़ जमाई चेतना से बुद्धि का उपयोग करना अभी कठिन था, इसलिए अब तक के आविष्कार, खोजें और उनका उपयोग, किसी चीज़ को लाभ पहुँचाते हुए भी, किसी और चीज़ को हानि पहुँचाने वाले रहे।

★जीवन के मूल स्रोत की ऊर्जा को पृथ्वी-जगत में फैलाने वाले के रूप में जीने के लिए
उदाहरण के लिए, ऊर्जा विकसित करके उसका उपयोग करने जैसी बातें……, पेट्रोलियम और कोयले जैसे संसाधनों का विकास और उपयोग (दूसरी नई ऊर्जाएँ भी ऐसी ही हैं), आधुनिक सभ्यता को लाभ पहुँचाते हुए भी, हितों के झगड़ों और देशों के बीच दाँव-पेच की सामग्री भी बने, और इतने पर ही न रुककर, पृथ्वी की धरती, समुद्र और हवा को प्रदूषित करके, वायुमंडल का संतुलन बिगाड़कर, प्रकृति-जगत को अत्यधिक ठंड-गर्मी और मौसम की गड़बड़ियों के बार-बार होने की अवस्था तक धकेल दिया।
परमाणु बिजलीघरों और बाँधों आदि का संचालन, और दूसरे उद्योगों का ढंग भी, कुछ लोगों के लाभ के लिए बाकी बहुतों को अनगिनत हानि पहुँचा रहा है, है न।
सार यह है कि अब तक के आविष्कार और खोजें पूर्ण सामंजस्य वाली नहीं थीं, इसलिए उनका उपयोग करने वाले लोगों को लाभ और हानि दोनों भोगने पड़ते थे।
लेकिन अब से पूरी मानवता में दिव्यता में जड़ जमाई बुद्धि प्रकट होने लगेगी, इसलिए आत्मिक होते धरती के स्पंदन के बदलाव के साथ मिलकर, किसी को भी हानि न पहुँचाने वाली पूरी तरह स्वच्छ ऊर्जा प्रकट होगी।
लेकिन वह, जैसा अभी कहा, दिव्यता में जड़ जमाई बुद्धि के मानवता में सतह पर आए बिना नहीं होगा।
क्योंकि वह परम स्वच्छ ऊर्जा सबको जीवित रखने और अस्तित्व देने वाले ब्रह्मांडीय जीवन के मूल से प्रकट होती है, इसलिए उसे पृथ्वी-जगत में फैलाने वाले प्रतिनिधि, यानी मानवता, कम से कम उस चेतना-आयाम के निकट न बसे, तो ऐसा स्पंदन आकाश-धरती में प्रकट नहीं होता।
इसीलिए दिव्यता के पुनर्जागरण और चेतना के विकास की बात बार-बार कहता रहता हूँ। (जारी)






