आत्मिक दृष्टिकोण से देखा गया स्त्री और पुरुष के साथ जीने का सच्चा अर्थ (7/7)
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
★व्यक्ति को केवल भीतर की पुरुष-ऊर्जा और स्त्री-ऊर्जा का एकीकृत सामंजस्य करना है
ऐसी पुनरावृत्ति, अब बस, है न?
तुम्हारे लिए तुम्हारे बिल्कुल अनुकूल विपरीत लिंग का व्यक्ति अवश्य है।
वह शायद आज का साथी हो, या कोई और।
जिसके पास अभी ऐसा साथी नहीं, वह बस अपने भीतर को सँवार ले, तो आगे अवश्य मिल सकता है।
और अगर वह साथी आज के साथी से अलग कोई है, तो ध्यान देने की बात यह है कि उतावले होकर साथी बदलने की कोशिश न करो।
क्योंकि सच्चा मिलन, बस अपना भीतर सँवर जाए, तो स्वाभाविक रूप से आता है, और न जाने कब तुम्हारा संसार बदल जाता है।
और इस तरह की चिंता तो अपने जीवन के सार को भूल जाने पर पैदा होने वाली अकेली कुश्ती है न?
महत्वपूर्ण है, हमेशा चेतना को जीवन के मूल स्रोत की ओर ले जाकर, सब कुछ अवश्य बेहतर होगा इस पर परम विश्वास करके जीना।
यह अपने सार के जीवन का प्रकाश होने पर विश्वास करके, स्वयं उसी के रूप में जीना है, इसलिए वहाँ केवल उज्ज्वल विचार ही आते हैं।
बस इस तरह जीते रहो, तो अवश्य उस साथी से मिलोगे और जी सकोगे जिसके साथ सच्ची साझेदारी पूरी हो सके।
दोहराता हूँ, वह शायद सामने वाला व्यक्ति हो, या इसी आकाश के नीचे कोई अनजान।
किसी भी हाल में, बस अपने जीवन पर विश्वास करके जियो, तो संरक्षक आत्माएँ आपस में अच्छा तालमेल बिठाकर ऐसा होने की व्यवस्था कर देती हैं।
अपने जीवन पर विश्वास करके जीने के पीछे, पर्दे के पीछे ऐसा कार्य चलता रहता है।

साथ ही कहूँ तो, अगर साथी को बदलना चाहते हो, तो पहले खुद बदलो।
पिछली बात पढ़ो तो समझ में आएगा, खुद बदलना सबसे पहले करने वाली चीज़ है, और साथी को बदलने की कोशिश मूल रूप से देखें तो व्यर्थ का प्रयास है।
क्योंकि ज़बरदस्ती बदली गई चीज़ में अवश्य प्रतिक्रिया आती है, और मनुष्य ऐसा प्राणी है जो खुद संतुष्ट होकर न चले तो कुछ भी नहीं सीखता।
पति-पत्नी की रोज़मर्रा में भी, बस इस दृष्टिकोण पर खड़े होकर आत्म-निखार करते जाओ, तो अगर साथी सचमुच सच्चा साथी है, तो वह अवश्य आदर्श व्यवहार करने वाले व्यक्ति में बदल जाता है।
क्योंकि जो साथी के प्रति महसूस होता था वह तुम्हारे भीतर था, और तुम्हारे भीतर की चीज़ साथी पर प्रतिबिंबित होकर महसूस हो रही थी, बस इतना ही।
और जब यह पक्ष सचमुच गहराई से बदलता है, तो अंततः साथी के वचन-कर्म-व्यवहार तक बदल जाते हैं, और अगर साथी सच्चा साथी नहीं है, तो चीज़ें स्वाभाविक रूप से अलग होने की दिशा में चलने लगती हैं।
यह सचमुच इतना मज़ेदार ढंग से बदलता है, इसलिए अभ्यास करके देखो।
टोका-टाकी या शिकायत (असंतोष) संबंध सुधारने में शायद ही मदद करते हैं।
क्योंकि वे आखिरकार तुम्हारे ही पास लौट आते हैं।
तो इस बार की बात का सार यह है कि तुम्हारी चेतना का विकास तुम्हारे भीतर के प्लस और माइनस (पुरुष-ऊर्जा और स्त्री-ऊर्जा) को एकीकृत करना बन जाता है, बाहर मौजूद आत्मा के दूसरे आधे से मिलने का संबंध-सूत्र पक जाता है, और वास्तव में मिलकर आत्मा के अंतिम समापन में प्रवेश किया जा सकता है।
बस यह न भूलो तो कोई बात नहीं।
तुम अवश्य अपनी आत्मा के दूसरे आधे से मिल सकते हो, मिलकर आपस में एकीकरण आगे बढ़ेगा, और तुम अधिक गहरी चेतना के विकास की अवस्था अनुभव करोगे।
उस समय की प्रतीक्षा करते हुए, पहले अपने यिन-यांग के सामंजस्य का प्रयास करो।
क्योंकि वह समय अवश्य आता है। (समाप्त)






