दिव्यता को जीने के सच्चे अर्थ का बोध करने के लिए (उत्तरार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
★वह समय आएगा जब हर कोई दिव्यता को जिएगा
यह डराने की बात नहीं है, बल्कि अगर तुम आज की पृथ्वी की स्थिति को शांत मन से देखकर खुद से पूछो, “हम पृथ्वी की मानवता ने कहाँ रास्ता गलत लिया और इस तारे को आज जैसी कठिन स्थिति में पहुँचा दिया,” या “पृथ्वी के भविष्य को बनाए रखने के लिए हमें कैसे जीना चाहिए,” तो हर कोई अपने आप स्वयं जीवन के प्रकाश में आशा पाने लगता है।
और इस तरह हर कोई जहाँ पहुँचता है, वह है यह बोध: “हम पृथ्वी के लोग, सब मूल रूप से दिव्य अस्तित्व थे।”
आजकल जापान में किसी विशेष कौशल में निपुण व्यक्ति के लिए “तुम तो भगवान हो” जैसी बात कही जाती है, लेकिन ईश्वर उस अस्तित्व को कहते हैं जो ब्रह्मांड की रचना करता है, तारे बिखेरता है, वहाँ सब कुछ को अस्तित्व देता है, और हर आकाश-धरती में महान सामंजस्य का संसार स्थापित करता है।
उस अनंत सृजनशीलता को अपने भीतर हिस्से के रूप में धारण करने वाला अस्तित्व है मानवता।
इस बात को न भूलकर, अच्छी तरह याद रखना।
तुम स्वयं ही, सचमुच, ब्रह्मांड के मूल से निकली जीवन-किरण की एक धारा हो।
वह अनंत सृजनशीलता तुम्हारे अपने भीतर है।
भविष्य की फ़्री एनर्जी भी तुम्हारी अपनी जीवन-ऊर्जा ही है।
इस बारे में फिर किसी और अवसर पर बात करूँगा, लेकिन कुछ भी हो, तुम पृथ्वी की मानवता, तुम्हारे अपने सोचने से कहीं अधिक, अद्भुत संभावनाएँ छिपाए हुए अस्तित्व हो।

दिव्यता को केवल भौतिक मनुष्य की सोच के पैमाने से मापने की कोशिश करो, तो वह पूरी तरह मापी नहीं जा सकती।
भौतिक मानव-बुद्धि की सीमा को पहचानकर, जीवन के महासागर में कूद पड़ो।
यह शायद हवा में झूले से झूले पर कूदने जैसा कठिन लगे।
लेकिन जब दिव्य चेतना के बोध को गहरा करने के अभ्यास में तुम निपुण और पारंगत हो जाओगे, तो जैसे अभ्यास किया हुआ सर्कस का कलाकार बड़ी आसानी से झूले से झूले पर कूद जाता है, वैसे ही भौतिक मानव-विचारों से दिव्य चेतना के अनंत विस्तार में तुम्हारी चेतना सुंदर ढंग से सरक जाएगी, और व्यक्ति होते हुए भी समग्र होने के एकत्व के सार का बोध हो सकेगा।
तब अपने आप, तुम्हारे भीतर मूल से निहित दिव्यता का सार सतह पर प्रकट होने लगेगा, और अब तक जैसा ही रूप-आकार और स्मृति बनाए रखने वाले अस्तित्व होते हुए भी, भीतर से ब्रह्मांड तक फैली दिव्य चेतना में लौटकर, तुम पृथ्वी पर ईश्वर के रूप में सृजन-कार्य करने वाले बन जाओगे।
मत भूलना।
तुम ईश्वर (जीवन) के प्रकाश की किरण हो।
तुम समस्त सृष्टि को अस्तित्व देने वाला जीवन का प्रकाश ही हो।
सब कुछ के भीतर तुम हो।
तुम सब कुछ का सब कुछ होते हुए भी, व्यक्ति के रूप में अपनी निजता वाले तुम स्वयं हो।
पृथ्वी पर जीने वाले लोगों में भी तुम्हारी अनेक किरणें जी रही हैं।
मनुष्य इतना रहस्यमय अस्तित्व है।
अभी समझ में न आए तो भी ठीक है।
क्योंकि एक दिन समझने का समय आएगा।
याद रखना। (समाप्त)






