मन की गहराई के आकाश में चेतना रखकर जीने के लिए
प्रकाशित अद्यतन
निर्णय न करने वाली मनोदशा से जीएँ
जिस दिन पृथ्वी की शांति पूरी तरह धरती पर साकार हो, उस दिन तक, “जब तक अपने जीवन का अधिकार दूसरों को सौंपा हुआ है” इस शर्त के साथ, मन को धुँधला कर देने वाली घटनाएँ बहुत होंगी, और ऐसी असामंजस्यपूर्ण घटनाओं से टकराकर “शायद कुछ नहीं हो सकता” ऐसा विचार मन में कौंध सकता है।
पर चेतना के विकास की हृदय से कामना करके सत्य के मार्ग पर चलने वाले तुम, खुद चाहे किसी भी घटना से टकराओ, चाहे कैसी भी ख़बर आँख-कान में आए, परिवार, मित्र, परिचित चाहे कैसा भी वचन-कर्म करें, चाहे कुछ भी देखो-सुनो, किसी भी क़िस्म के काले बादल मन में न उठने दो, ऐसे जीना।
तुम्हारे मन में चमकते सूर्य को ढकने वाली कोई भी चीज़ बिल्कुल नहीं है।
तुम्हारे अपने भेजे विचारों के बादल के सिवा।
ऐसे विचारों के बादल से जीवन का प्रकाश न रुके, इसके लिए भी, तुम अपनी स्वाभाविक कोमलता से सब कुछ समेटकर स्नेह करो।
और यों ही बदलती रहने वाली धरती की घटनाओं को बस यथावत् स्थिति से देखते रहना ही काफ़ी है।
इसके लिए जान-बूझकर होंठों के कोने ऊपर उठाए रखना और भौंहें ढीली रखना कारगर है।
क्योंकि जब चेतना दिव्यता से हट जाती है, या अचेतन रूप से जीते हो, तब अनजाने ही होंठों के कोने झुक जाते हैं और भौंहों के बीच सिलवटें पड़ जाती हैं।
दुख हो, ग़ुस्सा आए, विलाप करने का मन हो, हार मानने का मन हो, इसके अलावा कैसा भी विचार उबलकर उठे, कोई भी निर्णय बिल्कुल न देना, और दे भी दो तो तुरंत छोड़ देना, किसी भी क़िस्म के विचार को आसक्त होकर न पकड़ना।
यही किसी भी चीज़ से बढ़कर अपने को चेतना का विकास कराने और असेंशन पाई अवस्था में जीने का रहस्य है।

आकाश का मन जीना है? या धरती का मन?
तो ऐसे मिटते जाने वाले पहलुओं के ही पीछे न भागकर, उज्ज्वल पहलू पर चेतना का फ़ोकस मिलाकर उसे जान-बूझकर खोजना भी महत्वपूर्ण है।
अब तक भी केवल बुरी चीज़ें नहीं थीं, और आगे पृथ्वी पर होने वाली घटनाओं में अतीत में कभी न देखी गई उज्ज्वल, आनंददायक, हर्ष की बातें भी बहुत-बहुत हैं।
सार यह है कि आकाश का मन जीना है? या धरती का मन? आकाश देखना है? या धरती? किस पर चेतना का फ़ोकस मिलाकर देखना है।
क्या देखना, क्या सुनना, क्या छूना, क्या सूँघना, क्या चखना, पाँच इंद्रियों से जो महसूस किया जाए वह कैसा हो तो अच्छा है, इसे अच्छी तरह परखकर चलाओ।
इसके साथ, क्या अंतर्ज्ञान से जानना, क्या सीधे बोध करना, ऐसी छठी, सातवीं इंद्रिय को भी पूरी तरह चलाओ तो कहना ही क्या।
आकाश की ओर देखते हुए फुटपाथ पर चलो, तो धूप चमकती हुई बरस रही है, है न।
शायद कम लोग जानते हों, पर वह बादल या बारिश के दिन भी उसी तरह बरसती रहती है।
नज़र घुमाकर घास-फूल, कीट, जानवर आदि के जीवन पर फ़ोकस करके उन्हें स्नेह से देखो, तो रोका हुआ प्रेम उमड़कर निकलता महसूस होता है, है न।
अभी तुम जहाँ भी हो, वहीं आकाश-धरती के गहरे प्रेम पर विचार करके चेतना को चौड़ा और गहरा घुलने दो, तो महाजीवन के प्रति न चुकने वाली कृतज्ञता भी उबलकर रिसने लगती है, है न।
इसके उलट, केवल ज़मीन देखते हुए चलो, तो नाली का ठहरा हुआ गंदा पानी दिखता है, फेंका हुआ कचरा या शराबी की उल्टी नज़र में आती है, मनुष्यों के भावनात्मक विचारों के रगड़ खाने-टकराने का दृश्य आँख-कान में आता है, है न।
अचेतन रूप से जीते समय इसी तरह, मन मन की गहराई के आकाश तक नहीं पहुँचता, इसलिए अनजाने ही धरती की गंदी चीज़ों की ओर विचार खिंच जाते थे, वहीं चेतना का फ़ोकस मिल जाता था, और मन में काले बादल पैदा करके आत्मिक प्रकाश (मन के) सूर्य की चमक रोक दी जाती थी।
इस तरह शुद्ध-अशुद्ध के मिले-जुले विकास के रास्ते की दुनिया में, तुम क्या देखते हुए, क्या महसूस करते हुए जी सको तो अच्छा लगे?
इस पर अच्छी तरह सोचकर, चेतना के इस्तेमाल के ढंग पर फिर से नज़र डालें।






