पृथ्वी की शांति के महान सामंजस्य के चित्र-पट की पूर्णता की ओर: एक-दूसरे के गुणों (रंगों) को जीवंत करके चित्रित करें (उत्तरार्ध)
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(पिछली बार से जारी)
हर व्यक्ति अपने रंग से पृथ्वी की शांति का महान सामंजस्य का चित्र-पट चित्रित कर रहा है
आम बोलचाल में “खूबी” शब्द है न?
हर व्यक्ति में कोई खूबी होती है न?
यानी तथाकथित मज़बूत क्षेत्र, और जिस पहलू में उस व्यक्ति का जीवन जीवंत हो उठे, उसे सक्रिय रूप से बढ़ाने में मदद करना अच्छा है।
उस “समथिंग” को जीवंत करके साधते जाने से हर कोई जीवन का मर्म पकड़ सकता है।
इस तरह जीने पर क्या होता है, तो सभी मार्गों के मूल और स्रोत तक पहुँच जाते हैं, इसलिए जो क्षेत्र मज़बूत नहीं उसका मर्म भी समझ आने लगता है, और न जाने कब कमज़ोर बातें भी कमज़ोर नहीं रहतीं।
इसीलिए कहता हूँ, “गुणों को बढ़ाने की ओर ले जाना अच्छा है।”
यह बात सतही जीवन की तकनीक नहीं है।
मनुष्य के लिए कमज़ोरी पर ध्यान लगाकर निष्क्रिय होने से तो, मज़बूती को जीवंत करके आगे बढ़ना अच्छा है।
और दूसरे शब्दों में कहें तो, आज के अपने अपर्याप्त स्थानों पर ध्यान लगाकर दूसरों से ईर्ष्या करने का समय है तो, आज के अपने पर्याप्त स्थानों को और निखारकर गहरा करते जाना अच्छा है।
यही सीधे-सीधे, हर किसी के अपने-अपने गुणों से एक-दूसरे की मदद और पूर्ति करने, और सावधानी से तैयार किए गए पूरक संबंध के शुभ संबंध-सूत्र को सतह पर लाने का रहस्य है।

ऐसा करने से मनुष्य खुद को ऊपर उठाने और दूसरों को ऊपर उठाने वाला, खुद को गहरा करने और दूसरों को गहरा करने वाला व्यक्ति बन सकता है।
इस नियम को समझ चुके तुम, आज से ही तुरंत आज़माकर देखो।
तुम्हारे मानवीय संबंध अवश्य सामंजस्यपूर्ण संबंध में आयामी उत्थान करेंगे।
दूसरों के प्रति असंतोष महसूस करना या केवल आलोचना और शिकायत मुँह से निकालते रहना, न दूसरों के लिए अच्छा है न अपने लिए।
यह एक-दूसरे की टाँग खींचकर बहुमूल्य नियति को धुँधला कर सकता है।
यह समझ में आ गया तो आज से, पहले अपने गुण खोजकर बढ़ाओ।
तब दूसरों के गुण भी दिखने लगते हैं।
तब अपने गुणों को जीवंत करके मदद करो और पूर्ति करो, बस।
उस समय पहुँचकर तुम जान जाओगे।
“लोग ठप्पे लगाने के ढंग से, हर कोई मनमाने ढंग से एक-दूसरे को, सफ़ेद को काला और काले को सफ़ेद देख रहे थे।”
और, “सब अपना-अपना रंग लाकर, एक-दूसरे के रंग की पूर्ति करते हुए, पृथ्वी की शांति के महान सामंजस्य के चित्र-पट को चित्रित करने की प्रक्रिया में थे।” (समाप्त)






